आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
जिसने कभी धूप में जलकर
किसी के पाँवों के छाले नहीं गिने,
वह क्या जाने
उस तपते रास्ते की खुरदुरी चुभन को!
मखमली गद्दों पर सोए हुए लोग
महज़ तसल्ली के दो शब्द बोलकर
समझ लेते हैं कि उन्होंने सब बाँट लिया,
पर इस दर्द को
वही जानता है
जिसके पाँवों की हर आहट
दर्द की एक नई चीख सुनाती है।
दूसरों के आँसू देखकर
सिर्फ आँखें भर लेना आसान है,
मगर वह खौलता हुआ लावा क्या है
जो भीतर ही भीतर सुलगता रहता है—
इसे महसूस करने के लिए
उसी आग में जलना पड़ता है।
कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना देना अलग है,
और उस वजन को खुद ढोना बिल्कुल अलग!
जब तक अपनी खाल न उधड़े
तब तक दूसरों के घाव की गहराई
सिर्फ़ एक नज़ारा बनी रहती है,
पीड़ा का यथार्थ नहीं।
वो कहते है न-
"जाके पैर न फटी बिवाई वो क्या जाने पीर पराई"।






कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना देना अलग है,
जवाब देंहटाएंऔर उस वजन को खुद ढोना बिल्कुल अलग!
सुंदर अंक
आभार
वंदन
आपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन. अच्छे लिंक्स
जवाब देंहटाएं