निवेदन।


फ़ॉलोअर

मंगलवार, 3 नवंबर 2026

4914.... अनकही मुकम्मल कविता


मंगलवारीय अंक में
आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
---------



​जिसने कभी धूप में जलकर

किसी के पाँवों के छाले नहीं गिने,

वह क्या जाने

उस तपते रास्ते की खुरदुरी चुभन को!

​मखमली गद्दों पर सोए हुए लोग

महज़ तसल्ली के दो शब्द बोलकर

समझ लेते हैं कि उन्होंने सब बाँट लिया,

पर इस दर्द को

वही जानता है

जिसके पाँवों की हर आहट

दर्द की एक नई चीख सुनाती है।

​दूसरों के आँसू देखकर

सिर्फ आँखें भर लेना आसान है,

मगर वह खौलता हुआ लावा क्या है

जो भीतर ही भीतर सुलगता रहता है—

इसे महसूस करने के लिए

उसी आग में जलना पड़ता है।

​कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना देना अलग है,

और उस वजन को खुद ढोना बिल्कुल अलग!

जब तक अपनी खाल न उधड़े

तब तक दूसरों के घाव की गहराई

सिर्फ़ एक नज़ारा बनी रहती है,

पीड़ा का यथार्थ नहीं।

‌वो कहते है न-

"जाके पैर न फटी बिवाई वो क्या जाने पीर पराई"।

-------
आज की रचनाऍं- 

 केबीसी की पितृसतात्मकता 



-----------


आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

2 टिप्‍पणियां:

  1. कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना देना अलग है,
    और उस वजन को खुद ढोना बिल्कुल अलग!
    सुंदर अंक
    आभार
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. आपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन. अच्छे लिंक्स

    जवाब देंहटाएं

आभार। कृपया ब्लाग को फॉलो भी करें

आपकी टिप्पणियाँ एवं प्रतिक्रियाएँ हमारा उत्साह बढाती हैं और हमें बेहतर होने में मदद करती हैं !! आप से निवेदन है आप टिप्पणियों द्वारा दैनिक प्रस्तुति पर अपने विचार अवश्य व्यक्त करें।

टिप्पणीकारों से निवेदन

1. आज के प्रस्तुत अंक में पांचों रचनाएं आप को कैसी लगी? संबंधित ब्लॉगों पर टिप्पणी देकर भी रचनाकारों का मनोबल बढ़ाएं।
2. टिप्पणियां केवल प्रस्तुति पर या लिंक की गयी रचनाओं पर ही दें। सभ्य भाषा का प्रयोग करें . किसी की भावनाओं को आहत करने वाली भाषा का प्रयोग न करें।
३. प्रस्तुति पर अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .
4. लिंक की गयी रचनाओं के विचार, रचनाकार के व्यक्तिगत विचार है, ये आवश्यक नहीं कि चर्चाकार, प्रबंधक या संचालक भी इस से सहमत हो।
प्रस्तुति पर आपकी अनुमोल समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक आभार।




Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...