सादर अभिवादन
बरसों के बाद
दो दिल आमने-सामने थे-
और साथ में थी,
मौन में लिपटी हुई
एक पूरी उम्र।
बाज़ार में बिकते हैं
यहाँ तरह-तरह के चेहरे,
कैंडी और टॉफियों के बदले
खरीदे जाते हैं ईमान।
कहाँ जरूरत है उन्हें
एक रात के स्वांग की—
जो डराते हैं बच्चों को
कंकालों और भूतों से,
मगर यहाँ तो
जिंदा आदमियों से
खौफ खाते हैं परिंदे भी।
मानवता अति विशिष्ट मानव उपयोगी चीज
नैतिकता गति परिशिष्ट समाज में दिखे खीज
आदर्श और सिद्धांत चर्चा के प्रचलित भेल हैं
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है
इसराज के सिद्धहस्त कलाकार ठाकुर सुखसागर सिंह अपने इलाके में डोंड़की वाले बड़का बाबू के नाम से जाने जाते थे। अपने जमाने में इसराज की जीवंत स्वर लहरियों से वे महफिल लूट लिया करते थे। आज जबकि इसराज के फनकार नदारद से हो गए हैं, तो बड़का बाबू की याद अनायास ही हो आती है।
हो भक्तों को पावन दर्शन,
है एक दर्पण गर्भगृह में
रात्रि भोजन भी विशेष था,
मिलजुल कर बनाया था सबने
जल्दी उठकर सुबह, चले फिर,
किया पड़ाव एमटीआर में
पुलकित ह्रदय लिए लौटे,
मधुर यादों को दिल में समेटे !
सादर समर्पित
वंदन






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