शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ओंकार जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
874.
दिवाली पर सफ़ाई
जो तुम हटा रहे हो,
बहुत क़ीमती है,
जो तुम रख रहे हो,
वही कूड़ा है।
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815. रंग-बिरंगा (8 हाइकु)
4.
चाँद-सितारे
नभ में चमकते
जैसे जुगनू।
5.
चाँद ने ओढ़ी
घटाओं की चादर,
रात धूमिल।
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श्रीराम : मर्यादा, धर्म और आदर्श
अयोध्या ने उस प्रभात न एक बालक को जन्म दिया,
युग के संकट का उत्तर, मानव को धर्म दिया।
दशरथ के आँगन उतरा था केवल राजकुमार नहीं,
वह था कालजयी संकल्प, कोई साधारण अवतार नहीं।
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रिश्ता बाप-बेटे का
फ़िल्म
का अंत मन को छू लेने वाला है और पिता-पुत्र के भावनात्मक संबंध पर केंद्रित यह
फ़िल्म निश्चय ही हृदय-विजयिनी है। सुनील शेट्टी एवं मयंक टंडन ने पिता-पुत्र की
भूमिकाओं को सजीव कर दिया है। नेहा, किरण खेर एवं
अन्य कलाकारों ने भी अच्छा अभिनय किया है। आनंद राज आनंद ने फ़िल्म में अच्छा संगीत
दिया है। शीर्षक गीत (ये कैसा एहसास है) सबसे अच्छा है। फ़िल्म का परिवेश गोवा का
एक ग्राम है तथा छायाकार ने गोवा की सुंदरता को रजतपट पर उतार दिया है।
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मंज़िलें किसे पसंद होती हैं भला
एक
और सूरज समंदर से उग रहा था। ढेर सारे लोग थे लेकिन कोई शोर नहीं था, न भीतर न बाहर।
कुदरत का यही कमाल है वो आपको ख़ामोशी का वो सुर थमा देती है जिसकी तलाश में हर कोई
भटक रहा है। वो सुर जो हमें हमारे भीतर ले जाता है। हमारे भीतर बिखरे कचरे को साफ
करता है और एक सुंदर जीवन की, सुंदर सपनों की जगह बनाता है। हर यात्रा अपने भीतर की उथल पुथल को थामने, ज़ेहनी उलझनों से
राहत देने का काम करती है। पहले से बेहतर मनुष्य बनाने की ओर अग्रसर करती है। अगर
यात्राएं यह नहीं कर रही हैं तो यक़ीन मानिए आप सिर्फ दौड़ रहे हैं, तस्वीरें ले रहे
हैं आप यात्री नहीं बन पाये हैं।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
सुंदर अंक
जवाब देंहटाएंसटीक रचनाएं
आभार
वंदन