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शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

4917 ..किसी के लौट आने की उम्मीद अब भी बाक़ी है

 सादर अभिवादन


कार्तिक मास (पूर्णिमांत) की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि
के दिन समुद्र-मंथन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे,
इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है। भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है



जैन आगम में धनतेरस को 'धन्य तेरस' या 'ध्यान तेरस' भी कहते हैं।
भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में
जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद
योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुये।
तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ

अब देखिए रचनाएं ....



मेरे पास पैसे नहीं हैं
पर मैं सकारात्मक रहूँगा,

मेरे विचार अच्छे हैं
मेरी संगति ठीक है

मेरा स्वास्थ्य अच्छा है।
मैं मंजिल के करीब हूँ,





वो शोर मृदंग मद्धम थाप बन
उधार का राहत दे जाता है
एक अरसे से उसे भूल जाने की नाकाम ज़िद में हूं।
कस्तूरी-मृग-सी बेचैन रही हूँ
अपनी ही कस्तूरी की महक से वंचित





"क्या हुआ मुनिया, 
कुछ कहना चाहती हो बिटिया ?" 
" पापा मुझे वो खाना है ! " 
" क्या खाना है ? " 
" वो जोशी अंकल के घर पर कटोरी में रखा है ना , वह मुझे खाना है ? " 
"अच्छा क्या है वो चीज़ ? "
 "पता नहीं क्या है, गुलाबी रंग की है ! "
 " अच्छा ! गुलाबी रंग की है ?" 
" कोई नाम तो होगा ? " 
" नहीं पता ! पहले कभी नहीं खाई ! " 
" ऐसी क्या हो सकती है 
जो तुमने अभी तक नहीं खाई ! 
कोई मिठाई है या फल ? "





स्वप्निल  चाहों   की   ठंडी  तासीरें
चिरागों  की   रोशनी  में  जलते

तिल - तिल  लौ   की   चुनर  में
तब  यथार्थ  को  जगह   मिलती  है

स्वप्नों   कों   पायदान   मिलता  है
सपनों   की   दुशाला   सींती





किसी के लौट आने की उम्मीद अब भी बाक़ी है, 
किसी के नाम से दिल में हलचल अब भी बाक़ी है।

हमने तो बहुत पहले उसे रुख़्सत कर दिया, 
मगर भीतर कहीं उसकी आहट अब भी बाक़ी है।

सादर समर्पित
वंदन

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