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रविवार, 8 नवंबर 2026

4919...फटना ही है, तो रॉकेट की तरह फटो...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ओंकार जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।

चित्र साभार:गूगल 


        अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व दीपावली भारतीय समाज में विशेष महत्त्व रखता है जो व्यापार को बड़े पैमाने पर प्रभावित करता है। पाँच दिवसीय दीपावली का पर्व धनतेरस से भाई दूज तक बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। उजास का यह महान पर्व कालांतर में कब पटाखों के धमाके जुड़ गया कि आज पटाखों को लेकर की जा रही अपील हमें नाग़वार गुज़र रही है। मूलतः यह त्योहार समाज में सद्भाव और भाईचारे को बढ़ावा देता है। हरेक उम्र के लोग दीपावली को लेकर अपने-अपने ढंग से उत्साहित रहते हैं।

      दीपावली पर्व से अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हैं जिनमें प्रमुख कथा है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम इस दिन माता सीता और अनुज लक्षमण के साथ लंका विजय के उपरांत अयोध्या लौटे थे तब अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में हर्षोल्लास के साथ घी के दीये जलाये थे जो बाद में एक परंपरागत त्योहार का रूप लेकर आज तक हमारे जीवन में ख़ुशियों व उल्लास का संचार करता आ रहा है। ऐसा त्योहार जो सामाजिक तानेबाने को हर बार और मज़बूत करता है तो दीपावली स्वतः अपना महत्त्व स्थापित करती है।

        'पाँच लिंकों का आनन्द' परिवार की ओर से आप सभी सहृदयजनों को हार्दिक शुभकामनाएँ।

*****

आइए अब रविवारीय अंक में पढ़िए चुनिंदा रचनाएँ-

चलो! राम से जोड़ें नाता

तुम ही तुरीय, तुम ही स्वप्न,

तुम ही जाग्रत और सुषुप्त हो।

अंतःस्थल के अन्वेषण के,

सोपानों के सूत्र गुप्त हो।

*****

875.पटाखे

फटना ही है,

तो रॉकेट की तरह फटो,

ज़मीन पर नहीं,

आसमान में जाकर फटो।

थोड़ा ज़ोर से फटो,

लोग देखें तो सही,

डरें तो सही,

कुछ तो असर छोड़ो

फुस्स होने से पहले।

 *****

826 ...अकेला हुआ तो अकेला चला मैं

कि तब था फरिश्ता, अब मै हूँ बला

जो भी था पास, लुटा कर चला मैं

जश्न में थी भीड़ पर दुख में अकेला मिला मै,

सारे गुणों-अवगुणों को ढोता चला मैें

*****

सत्तरवाँ साल

कोई खुदा तो है अंतर्मन में

सीने में खड़ा वो बच्चा,

बहुत है कूदा, बहुत है फाँदा

भागते चोर की लँगोटी पकड़ के क्या फ़ायदा

ज़िन्दगी रही अनुभवों की यात्रा

हर जेब है भरी हुई ,भारी सी

मुद्दतें हो गईं ख़्वाब बुनते हुए

अब जो हासिल हुआ, है उधड़ने लगा

*****

मनाओ दिवाली...

राम सिया और लखन लाडले के आने से,

अंकुरित हुआ  उल्लास से, उर जो था सूखी डाली,

मनाओ दिवाली।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


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