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गुरुवार, 6 अगस्त 2020

1847...हम शांति-सौहार्द की नींव रखते चले आए हैं...

 सादर अभिवादन। 

गुरुवारीय अंक में  आपका स्वागत है।

हम 
शांति-सौहार्द की 
नींव रखते 
चले आए हैं,
दुनिया में 
कहीं 
नींव उखाड़ते 
लोग लहूलुहान 
नज़र आए हैं। 
-रवीन्द्र 
 
आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

 आकांक्षा (ग्यारवा संकलन )

बहुत प्रयास किये गए थे
 प्राणों  की आहुती भी दी थी कितनों ने
जो अब फलीभूत हुई  है
अब प्रतिफल मिला है इस रूप में  |

घर-घर दीप जलाएंगे.... अनुराधा चौहान 

 

सरयु किनारे भव्य राम का
मंदिर होगा अति सुंदर।
राम लला तंबू से उठकर
पहुँचेंगे घर के अंदर।
सदियों का वनवास भोग के
राम लला घर आएंगे।

तिरंगे का करें सम्मान आँखों पे... रेखा जोशी 

 करें हम नमन भारत के जवानों को

शहीदों का रखेंगे मान आँखों पे

करेंगे खत्म घोटाले सभी मिल कर

रखेंगे देश का अभिमान आँखों पे

 बेटी का विवाह नहीं हो पाता, दूल्हा कौन खोजे, इंतजाम कौन करे? सामाजिक रूप से उनका कोई पालनहार नहीं।

अब क्या हो? क्या वे दोनो आत्महत्या कर लें जो कि पड़ोसी चाहते हैं, ताकि उनका घर हड़पा जा सके. मां 60वर्ष से ज्यादा की है और बेटी 40 के आसपास। उम्र साथ छोड़ रही है....
समाज भी... संकट गहरा है और हितैषी के बराबर। अब रसोई के सारे कनस्तर खाली हैं और भरने वाला कोई नहीं...
कोई कुछ करेगा क्या????

कोरोना के इफेक्ट्स और बचने के उपाय --डॉ. टी.एस. दराल 

 

एक घंटा पसीना बहाकर तन और मन दोनों चुस्ती और स्फूर्ति से भर जाते थे।  सभी मित्रों और रिश्तेदारों से दूर लॉक डाउन में घर में बंद रहकर, मानसिक तनाव और बेचैनी होना भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। ऐसे में बहुत से लोगों को मानसिक विकार पैदा हो जाते हैं।  चिड़चिड़ापन, नींद आना , बात बात पर झगड़ना आदि हरकतें इस दौरान बहुत देखने में आईं। इससे बचने के लिए आवश्यक होता है कि आप अपने आप को व्यस्त रखें, कुछ ऐसे काम करें जो समय के आभाव में पहले नहीं कर पा रहे थे, नए शौक बनायें या पुराने शौक पूरे करें।

 

हम-क़दम का एक सौ तीसवाँ विषय
आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे आगामी मंगलवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव

 

रविवार, 19 जनवरी 2020

1647.....फिजाँ कैसी मीठी मीठी हो रही है मक्खियाँ ही मक्खियाँ हर तरफ हो रही हैं मधुमक्खियाँ नजर अब आती नहीं हैं ना जाने कहाँ सब लापता हो रही हैं

जय मां हाटेशवरी......
मेरी प्रस्तुती का दिन आते-आते.....
मौसम फिर बरफीला हो जाता है.....
आज भी बर्फ की संभावना है.....
लाइट तो कल से ही गुल है......
कुछ बैकप से ही काम चलाते हुए....
पेश है....मेरी पसंद.....

विरोध का चेहरा या महिलाएं बनीं मोहरा ?दिलों में विरोध की आग गली -गली शाहीन बाग़ ?अधिकार तो चाहिए लेकिन कर्तव्य कौन निभाएगा ?
इसी के परिणाम स्वरूप हिन्दुओं की कुलाबादी जहां १९५१ में पाकिस्तान की कुलाबादी का मात्र तीन आशारीया चार चार (३. ४ ४ फीसद )वह वर्तमान में घट के १. ५ फीसद
रह गई है।  मुस्लिम बहुल पाक ने तो इसके बाद अहमदिया सम्प्रदाय के साथ साथ शियाओं को भी मुसलमान मानने से इंकार कर दिया। अहमदिया और शियाओं को पनाह  देने की
तरफ़दारी  कथित शाहीन बाग़  ने भी नहीं की है।
भारत ने सोच के धरातल पर ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ हो।तमिल  टाइगर्स के २००९ में सफाये के बाद से ही हालात सामान्य हैं वहां
से भारत चले आये तमिल भाई वहां स्थिति सामान्य होने के कारणलौट जाना चाहता है वापस

फिजाँ कैसी मीठी मीठी हो रही है मक्खियाँ ही मक्खियाँ हर तरफ हो रही हैं मधुमक्खियाँ नजर अब आती नहीं हैं ना जाने कहाँ सब लापता हो रही हैं
 इधर
कुछ
सालों से
क्यों
लापता
सी
हो रही हैं
लिखने लिखाने
की
जगह सारी
भरी भरी
सी
हो रही हैंं
कैसे लिखे
कोई
कुछ
पता ही
नहीं
चल रहा है

एहसास का चादर
एहसास का चादर
जीवन को अगर समझना था तो,
इसमें उलझना शायद
बहुत जरूरी था।

तुम आईना फेंक कर..
तो देखो,
तुम्हें दिल के टूकड़े
गिनने नही पड़ेगे।

कमाल है ...
तो क्या अब हमें यह गद्दार काटेंगे नहीं?
नहीं, अब आपस में ही काटम काट चल रहा है ...
पर इनके फ़ितरत की फिक्र है, बंधु !!
बाकमाल यह,
कभी भी किसी करवट बैठ सकतें हैं, बंधु !!!

दोहा गीत
  जगत करम का खेत है , जो बोए सो पाय,
 प्रेम भाव से सींच ले , नाही तो पछताय।
अपनेपन का लोप है , रिश्ते कहाँ पुनीत।
कहता मन भौरा बनूं , गाऊँ मीठे गीत ।

प्रेम
दूसरे को प्रीतिकर हों ऐसे वचन ही मुख से निकलें
इस सजगता का नाम ही प्रेम है
सब कुछ साझा है इस जहाँ में
हर कोई जुड़ा है अनजान धागों से,
धरा, गगन, पवन, अनल और सलिल के साथ
जुड़ाव महसूस करने का नाम ही प्रेम है
रक्त पिपासा
 वो देखो बैठा है रक्त-पिपासायुक्त मानव चारों ओर
जो रक्त की तेज़ धार देखकर
मन ही मन में शैतानी हँसी  हँसता है
और अपने ही भ्रमजाल में खुद को लपेटे सोचता है
इंसान नहीं दानव बन रहा हूँ

एक व्यक्ति का रक्त नहीं रक्त की नदियाँ बहाने को तैयार हूँ
इस बदलते दौर में
मनुष्य होने के लिये शर्मिंदा हूँ

धन्यवाद।

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