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बुधवार, 9 जनवरी 2019

1272..धूप सखी की अँगुली पकड़े..


।।प्रातः अभिनंदन।।
"कुहरे की झीनी चादर में
यौवन रूप छिपाये
चौपालों पर
मुस्कानों की आग उड़ाती जाये
गाजर तोडे
मूली नोचे
पके टमाटर खाये
गोदी में इक भेड़ का बच्चा
आँचल में कुछ सेब
धूप सखी की अँगुली पकड़े
इधर-उधर मँडराये"
~ निदा फाज़ली
सर्दियों का आनंद उठाते हुए,अब नज़र डालें आज की लिंकों पर..✍
♦♦

मनीष प्रताप  सिंह 'मोहन' जी की ग़ज़ल..

मैं भीड़ में भी हूँ, और तन्हाइयाँ भी है ।
आसान नहीं जिंदगी, कठिनाइयाँ भी है ।
यादों की शाम सजाकर , बैठा मैं चाँद पर,
बादल घिरे अतीत के, पुरवाइयाँ भी है ।
♦♦
दुर्भाग्य यह कि ये वो ही अर्चना वर्मा है जिन्हें राजेन्द्र यादव ने छापा और मंच दिया हंस का
60 के बाद अक्ल का कोई भरोसा नही, ..
♦♦
आदरणीय पुरूषोत्तम जी की..उम्र के पड़ावों 
का सुन्दर चित्रण..

उस दरमियाँ, था मैं भी कभी जवाँ,
उत्थान ही, दिखता था हर पल,
मोर सा, आसमान, नाचता था सर पर,
♦♦
आदरणीया अनुराधा चौहान जी की रचना..

रात ने अंगड़ाई ली
बर्फीली हवाओं में
तेरी यादों ने आवाज़ दी
♦♦
आजकल कुछ बोलने की इच्छा नहीं होती शब्द 
जैसे  चूकसे गये हैं. तो आज सिर्फ मौन.....
आदरणीया  मुकुल कुमारी अमलास जी की 
रचना के साथ ..बस..यहीं तक..

भावनाओं को व्यक्त करने में
हो जाते असमर्थ
तब बचता
एक ही सहारा
♦♦
हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह'तृप्ति'...✍




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