शीर्षक पंक्ति: आदरणीय नीरज कुमार जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा
रचनाएँ-
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम …
भूले-बिसरे कमला नेहरू के दिनों को याद करने का दिन आया है
मैं अपनी तूलिका से बना दूँगी वहाँ
महकते फूल सितारे दमकता चाँद
और खूब सारे हंसते खिलखिलाते
चेहरे मासूम बच्चों के…!!
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वो पूछते हैं क्यों फ़ना
रखोगे
तो, ईश को कब तक मना रखोगे ?
कैसे होगी जीत बाज़ी की तब,
जब दाँव अपना बेमाना रखोगे !!
न घर बना ना असर बना ,
जीवन टूटा शहर बना I
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
कब तक ये झूठी सी अना रखोगे
जवाब देंहटाएंकभी तो पस-ए-आईना रखोगे !!
आभार
सुंदर अंक आज का
सादर वंदन