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रविवार, 1 मार्च 2026

4668...मेरा मन ही है जो सब जानता है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ. जेन्नी शबनम जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

सफ़र का क़िस्सा

यक़ीन की धरती कब-कब हिली
आसमाँ से दुःख की बदली कब बरसी
यादों के पिंजरे में हर अनकहा पड़ा है
मेरा मन ही है जो सब जानता है
उम्मीद की हवा झुलस गई
मोहब्बत की शाख टूट गईं

*****

हम दोनों प्यार में थे

हम मिले गिरजे की उन सीढ़ियों पर

जहां न जाने कितने नाउम्मीद

लोगों के कदमों के निशान थे

कितनी उदासियों का ठौर था

कितने कनफेशन सर झुकाये बैठे थे

*****

गिला

झांकता, कभी खिड़कियों से,

जाग उठता, कभी पवन की झिड़कियों से,

शाख की, रंगीनियों से,

पर, रूबरू हो न सका, उन टहनियों से,

झूलती, उनकी पत्तियों से,

कब हुआ जीर्ण, टूटकर शाख से, वो कब गिरा!

पता ही ना चला....

 व्यस्तताओं से रहा, इक गिला,

कब हुआ रंगी, शाम का बादल, कब दिन ढ़ला!

पता ही ना चला....

*****

सरपंच सच

मास्टर को सरपंच साहेब हड़का रहे हैं, अवमानना के आरोप में! गलती से मास्टर ने सही लिख दिया है। सरपंच बैठा है ऊँचे इजलास पर। मास्टर नीचे  थरथर काँप रहा है। डर के मारे खड़ा। ……

अश्वत्थामा बेचारा।जीने को अभिशप्त। हाँफ रहा है बुरी तरह । आधा जागे। आधा सोये।

राजा  जनक को देखता है। महर्षि अष्टावक्र के चरणों पर। अपने सपनों का अर्थ पूछते। कौन सच । वह सच। या यह सच!

*****

नई दिशा

काउंसलिंग 18 से 22 जून तक थी. आयुष को 19 जून को आईआईटी दिल्ली पहुँचना था. गुप्ताजी और आयुष 18 जून की शाम दिल्ली के लिए ट्रेन में बैठ गए. अगले दिन आईआईटी दिल्ली में मूल दस्तावेजों की जाँच हुई, आयुष ने सेंटर एलॉटमेंट के लिए चॉइस शीट भरी और उसी शाम उन्होंने वापसी की ट्रेन पकड़ ली.

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

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