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मंगलवार, 31 मार्च 2026

4698....बाहर हवा ज़हरीली है

 मंगलवारीय अंक में

आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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क्यों न कुछ दर्द उम्मीद की दरिया में धोया जाय,
आसान नहीं फिर भी, कुछ सपने बंजर आँखों में बोया जाय।

आज की रचनाऍं- 


जानता हूँ तुम्हें 
नौ महीने हो गए गर्भ में, 
पर छटपटाओ मत,
हो सके, तो अंदर ही रहो,
बाहर हवा ज़हरीली है,
ड्रोन, बम और मिसाइलें 
तुम्हारे इंतज़ार में हैं। 


रविवार को होता है
थोड़ा-सा ब्रेकअप, थोड़ा मौन,
फिर दिल कहता है
चलो, रीस्टार्ट करो ये लव-ज़ोन।
और फिर
मैं अपनी उसी माशूका से
सोमवार को आँखें चार करता हूँ।



मुक्त हुई कब, कल्पनाओं में कैद होकर,
मुक्त, मैं भी विचरती, यूँ अगर,
होती बन कर हकीकत, राह में साथ गर,
निहारती, खुद को संवार कर !

कल्पनाओं से, गुजर कर......

सुनकर, उसकी बातें, हुआ मैं निरुत्तर,
विलीन थे शब्द मेरे, आह पर,
मैंनें, दुःख ही दिए, उनमें यूं रंग भरकर,
दूर वे कितने, मेरे संग होकर!




खोया हुआ पल, यादों में ढला,
वो हँसी कहीं, खामोशी में चला
आज वही रेत सा, फिसलता जाए 
खोया हुआ पल, वापस ना आए,
दिल ये मेरा, उसे ही बुलाए।




इन दोनों के अलावा .. पुरखों की पाखंडी सोचों के अन्तर्गत फैलायी हुई विषाक्त भ्रांति या प्रथा तो है ही कि .. बेटे से ही किसी का तथाकथित वंश चलता है और उसके द्वारा ही दी गयी तथाकथित मुखाग्नि से तथाकथित मोक्ष की प्राप्ति भी होती है .. शायद ...

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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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1 टिप्पणी:

  1. क्यों न कुछ दर्द
    उम्मीद की दरिया में
    धोया जाय
    बेहतरीन अंक
    आभार
    वंदन

    जवाब देंहटाएं

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