।।प्रातःवंदन।।
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें या औरों के
ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है।
इसलिए ऐ शरीफ इंसानो
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है।
साहिर लुधियानवी
बडी पशोपेश में आजकल दुनिया ..पर बुधवारिय प्रस्तुति कुछ इस तरह जहा चंद पल बिताइए ✍️
सबको लगता है कि वो अब ख्याल नहीं करता है,
पैसे तो भेजता है मगर देखभाल नहीं करता है।
कोई जा के बता दो परदेश में बैठे बेटे का हाल,
वो क्यूँ किसी से कोई सवाल नहीं करता है।
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बाबा,
अब तुम सुकून से सो जाया करो।
रात को आँगन में चाँद जब उतर आए,
तो उसकी चुप्पी को ओढ़ लिया करो।..
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शीर्षक: “राख से उठती हुई साँस”
नवंबर की ठिठुरन से लेकर
आज की धूप तक,
कितनी ही आंधियाँ आईं—
कुछ बाहर चलीं,
कुछ भीतर घर बना गईं।
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समाप्ति की क़गार पर खड़े
बोझिल संबंधों के कदम,
छटपटाते बेचैन हो,
दहलीज पार करने को,..
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
बेहतरीन अंक
जवाब देंहटाएंआभार
सादर