सादर अभिवादन
आखा तीज
सानन्द सम्पन्न हुआ
रचनाएं ....
कहते हो तुम कि अब नहीं तुमको मेरी गरज़
तकदीर के शतरंज पर ये किसकी चाल है ?
हमने तो रंगमंच पर किरदार निभाया
कैसा रहा , ये हाज़िरीन से सवाल है ...
वह खाना इतना अच्छा बनाती थी
कि उसके हिस्से में तारीफ़ आती थी,
पूरा खाना कभी नहीं आता था।
पाँच भूत आदि सभी मिथ्या,
किंतु उन्हें मन सत्य मानता,
महासागर यह अज्ञान का,
अंतहीन प्रतीत है होता !
न जाने किस अनंत काल से,
धार समय की बहती जाती,
सृष्टि हुई, फिर प्रलय घटा है,
बार-बार यही सृष्टि होती !
“ठीक है सर, मैं शपथ पत्र और दस्तावेज ले जा रही हूँ. इन्हें डिजिटाइज करके अपना काम शुरू करती हूँ.
शुक्रवार में केवल दो दिन बीच में हैं. मुझे तेजी से काम करना होगा. कोटा की मुझे अब फिक्र नहीं है,
आकाश ने वहाँ संभाल लिया है. अब मेरा पूरा ध्यान इन कागजों में छिपे उन झूठों को पकड़ने पर है
जिनके सहारे वे साढ़े तीन सौ से अधिक परिवारों का भविष्य लील जाना चाहते हैं."
सच तो ये है—
मंज़िल की तलाश में
मैं हर रास्ते पर चला हूँ,
हर मोड़ को अपनी मर्ज़ी समझा है।
और हर चौराहा
मुझे यही समझाता रहा—
कि चुनना मेरा हक़ है।
सादर आभार
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