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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

4708... अपने कर्म ही

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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हर माह का अपना सौंदर्य, गंध, स्पर्श, शब्द संगीत और रस होता है। फागुन रंग का, चैत गंध का, बैसाख रस का महीना है। फागुन बीतते ही चैत के शब्द अलग हो जाते, हवाओं में अलग महक और गीत भर जाते हैं। बैसाख आते आते मौसम की छाप बदल जाती है। गुलमोहर और अमलताश के साथ नीम के फूलों से, जामुन के नए पत्तों से, अमिया की खुशबू  से बैसाख का सौंदर्य निखर आता है। 

 बैसाखी हवाओं के स्पर्श को महसूस करिए,  रसभीनी, थोड़ी अलसाई और तरुण भाव के साथ बह रही बैसाखी हवाओं को त्वचा पर से गुजरते महसूस कीजिए। बैशाखी हवाओं में घुली कोयल की कटीली तान भोर की  छुअन को नशीली  बना देती है। सांझ को चाँदनी की छाँह में बेली की कली से फूटती गंध मन को आनंद से ओतप्रोत कर देती है।

घड़े का  ठंडा पानी ,  गुड़ का शरबत,अमझोरा,  शिकंजी  और सत्तू का स्वाद बैसाख का स्वाद है। चूल्हे पर सिंकती नए गेंहू की रोटी की गंध बैसाख की गंध है। फूलों के दिन बीत गए, बैसाख फलों के रसगंध से भरता है। महुए का रस, आम का रस, बेल का रस ही तो बैसाख का रस है।



आज की रचनाऍं- 



अपने कर्म ही

पहचान बनाते हैं ।

अपने कर्म ही

धूल चटाते हैं ।


बाकी सारी बातें

सब बेकार हैं ।

अपने कर्म ही

बनाते-बिगाङते हैं ।




बोध आत्मा का करें किस विधि

कहाँ उस आनंद को पाएँ, 

  उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि

कैसे लौट वहाँ घर जायें !



युगों
का थमा हुआ
अट्टहास,
पुनः
हो चला है जागृत, पुनर्जन्म के संधान में
चल पड़े हैं अभिशापित सभी जीवित
या मृत, अनंत पथ के वो यात्री
पाना चाहे इसी धरा पर
सूत्र अमर्त्य, अलौकिक
रंगमंच पर है मंचित
छायानृत्य ।




आँखों में यौवन की चपलता पर

किनारों पर  मंडरा रही थी 

भूख की चिलचिलाती धूप

हँसती थी बेफिक्र सी हँसी

नहीं, उमड़ते गड्डे उसकी गालों में

पेट छिप जाता पीठ के अंदर





इस मनोरम विधि से अगले दिन दोपहर तक साल भर पहले हुये कत्ल के बारे में आधा गाँव जान गया,

गाँव का सरकारी चौकीदार जान गया और जान गया निकटस्थ थाना।

शाम होते न होते कातिल किसान के हाथों में लोहे के कंगन पड़ गये।

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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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