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शनिवार, 11 अप्रैल 2026

4709 ..हठ कर बैठ गया आमरण अनशन पर और मैं बन जाऊँगा धरती का भगवान।

 सादर अभिवादन


हो गए चूर सपने बच्चों के
खा गई बाप को ये बोतल क्या

सच ओ ईमाँ की बात करता है
उसको कहता जहां ये पागल क्या
 
ढूंढ ही लेते हैं मुझे ये ज़ख़्म
ज़ख़्म  भी बन गए है गूगल क्या
 
गुमनाम पिथौरागढ़ी  


रचनाएं ....




वह उंगली
दरअसल किसी एक की नहीं—
पूरी व्यवस्था की है,
जो हर चौराहे पर
खुद को बेकसूर साबित कर देती है।





प्रशांत बाबू को मेवाड़ भोजनालय पहुँचने में नौ बज गए, वहाँ प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य उन्हें इन्तजार करते मिले. कारखाना बंदी का आवेदन और उसके साथ के दस्तावेजों को चारों ने देखा.

प्रिया ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, "सर¡ यह घाटा पूरी तरह 'मैन्युफैक्चर' किया लग रहा है. हमें इनकी बैलेंस शीटों का एनालिसिस करना पड़ेगा. क्या हम इस आवेदन और दस्तावेजों 
को अपने साथ ले जा सकते हैं?”




प्यार का ये सिलसिला शायद 
यूँ ही चलता रहेगा,
कोई चाँद से, कोई धरती से, 
यूँ ही दिल लगाता रहेगा।




हठ कर बैठ गया
आमरण अनशन पर
और मैं बन जाऊँगा
धरती का भगवान।
पर कोई नहीं आया
तब मैंने
इससे कहा
उससे कहा
कोई तो आओ
मुझे संतरे का रस पिलाओ
एक भिक्षु ने देखा
तो दौड़ा आया
मुझे रस पिलाया
पात्र अपनी झोली में रख लिया।
अनशन से मुक्ति मिली
नृत्य गया भाड़ में
मेंने तो पहले ही कह दिया था
ना मैं हारा
ना तू जीता
चलो अब फिर से
तेल निकालें
अपने-अपने कुयें से।




दादी ने पादरी साहब के कान खींचते हुए कहा, वाह रे अधर्मी ! 
मुझे एक दिन केक खिलाया तो मैं ईसाई हो गई। और मैं प्रतिदिन तुमको अपने घर का खिलाती हूँ, 
तो तू हिन्दू कैसे नहीं हुआ रे नमक हराम ? 
तू तो प्रतिदिन सनातन धर्म की इस आदि भूमि का वायु, जल लेता है 
फिर तो तेरा रोम-रोम हिन्दू बन जाना चाहिए।
अपने स्वधर्म और राष्ट्र को पथभ्रष्ट होने और गलत दिशा में जाने से बचाने वाली 





खोखली सी नींव पर ही घर बनाते आजकल।
मौन हों संवाद पूछें क्यों डराते आजकल।।

जो हृदय की वेदना जग से छुपाने में लगे,
वह स्वयं की मुश्किलों को ही बढ़ाते आजकल।।

सादर समर्पित
सादर वंदन

1 टिप्पणी:

  1. कोई तो आओ
    मुझे संतरे का रस पिलाओ
    एक भिक्षु ने देखा
    तो दौड़ा आया
    मुझे रस पिलाया

    जवाब देंहटाएं

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