शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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सोच रही हूॅं ----
इंसान
सभ्य और असभ्य की
परिभाषा भूल चुका है।
अंहकार का पोषण
सर्वोपरि है,
क्या मनुष्यता, इंसानियत
धीरे-धीरे इतिहास के
पृष्ठों में सुंदर कहानियॉं
बनकर जायेंगी?
क्या सचमुच
"जीओ और जीने दो"
का सिद्धांत
मानना बहुत कठिन है?
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आज की रचनाऍं-
सामूहिक मृत्यु को सहज बनाते
विवेकहीन नेताओं के आदेश
भरा है जिनमें तकनीकी आवेश
अपने लिये सुखद मृत्यु की कल्पना में डूबे हैं
धिक्कार है ऐसे संवेदनाविहीन दिमाग़ों पर!
जागो शांति के मसीहाओ!
वक़्त रहते पृथ्वी को वीरान होने से बचा लो!
चश्मदीदों ने
दबी ज़ुबान में बताया—
जब आसमान में
कुछ गिद्ध मंडरा रहे थे,
तब तक
वह ज़िंदा थी।
युद्ध जारी है
युद्ध जारी है
हर तरफ़ दहशत, ख़ून-ख़राबे
चिथड़े-चिथड़े जिस्म की पहचान नहीं
किसी का अपना शहीद हुआ
न जाने कितनी जानें क़ुर्बान हुईं
इस ख़ौफ़नाक मंज़र पर
कोई जश्न मना रहा
तो कोई छाती पीट रहा।
मेरी यादों का आकाश
बिक रहा है ज़मीर यहाँ
बस बची है अंगारों के नीचे
दबी हुई कुछ राख़ मेरे
ज़िन्दा जज़्बों की
जो धाँय धाँय उड़कर
काला स्याह कर रही है
मेरे यादों के आकाश को
उसकी बाते सुनते सुनते और गाड़ी के तेज़ झटकों से कब ऋतु की आँख लग गई उसे पता ही नही चला ,आँख खुली तो मथुरा स्टेशन के प्लेटफार्म पर गाड़ी रूकी हुई थी ,घड़ी में समय देखा तो ठीक चार बज रहे थे ,उसने प्लेटफार्म पर नज़र दौड़ाई तो देखा वह औरत बेंच की एक सीट पर गोद में बच्चा लिए बैठी हुई थी और उसकी बगल में दो बड़े बड़े अटैची रखे हुए थे ,लेकिन उसकी बेचैन निगाहें अपने पति को खोज रही थी ,पांच मिनट तक ऋतु उसकी भटकती निगाहों को ही देखती रही ,तभी गाड़ी चल पड़ी और वह औरत धीरे धीरे उसकी नज़रों से ओझल हो गई l
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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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सुंदर अंक
जवाब देंहटाएंलोग तो हैं
उन्हें जिंदा रहना है
तो कैसे डूबेगी पृथ्वी
आभार
वंदन