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रविवार, 5 अप्रैल 2026

4703...रोते चातक के ऑंसुओं की नमी से जब फूटेंगे कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे हरे-भरे पेड़...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया श्वेता सिन्हा जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक में पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

युद्ध और चिड़िया 

बंजर हुई धरती की दुर्दशा पर
रोते चातक के ऑंसुओं की नमी से
जब फूटेंगे 
कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे
 
हरे-भरे पेड़
उनकी डालियों में वो
फुदक-फुदक कर गा सकेगी
फिर से प्रेम और करुणा से भरी

जीवन की पवित्र प्रार्थनाऍं...।

***** 

मैग्मा की रसीद

चारित्रिक पतन सिर्फ़ स्त्रियों के लिए ही क्यों कहा जाता है? अगर कोई स्त्री वैश्या बनती है, तो क्या पुरुष सहभागी नहीं होता? जो स्त्री को मैला कहकर खुद को साफ़ घोषित कर देते हैं, वे आखिर किस आईने में खुद को देखते हैं?” अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना ही वह बोल भी पड़ीभीड़ में हलचल हुई। मंच पर बैठे चेहरे असहज हो उठे।

गाँव में भीड़ द्वारा स्त्रियाँ प्रताड़ित की जाती हैं, तो उसके चरित्र को मोहरा बनाया जाता है, कार्यालय में किसी स्त्री को पदोन्नति मिल जाए, तो उसकी मेहनत नहीं, उसके चरित्र पर सवाल उठते हैं। और हद तो यह है कि साहित्यजो समाज को दिशा देने वाला कहलाता हैवहाँ भी इस सोच से अछूते मनुष्य नहीं हैं।मेधा ने आगे कहाअब उसकी आवाज़ और गम्भीर हो गई थी

*****

लोक उक्ति में कविता

लोक उक्ति में कविता’* के मूर्त रूप लेने पर हृदय अगाध कृतज्ञता से भरा है। इस यात्रा में मिले सहयोग को शब्दों में पिरोना कठिन है, किंतु भावों की अभिव्यक्ति अनिवार्य है।​*प्रकाशक एवं मार्गदर्शक*​सर्वप्रथम, मैं *कल्पना पब्लिकेशन, जयपुर* की हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने मेरी अनुभूतियों को मुद्रित अक्षरों का स्वरूप प्रदान किया। विशेष रूप से, श्रद्धेय *डॉ. शास्त्री मयंकजी* के प्रति मैं नत-मस्तक हूँ, जिन्होंने अपनी ओजस्वी भूमिका और आशीर्वचनों से इस कृति की गरिमा बढ़ाई है।

*****

पुर्जा नहीं, इंसान

चारों उसी व्यक्ति के साथ कमरे के अंदर के दरवाजे से अंदर गए, वहाँ एक छोटे आंगन से सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं. फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरे में प्रशांत बाबू बैठे मिले, इस कमरे के पास ही एक हॉल था जिसमें कम से कम दो सौ लोग बैठ सकते थे. वहाँ कोई बैठक चल रही थी.

*****

संगठन में शक्ति

किसान ने एक योजना बनाई।

उनसे आठ  लकड़ियाँ मंगाई।

चार को  साथ रस्सी से बंधा।

चार को अलग - अलग रखा।

प्रत्येक पुत्र को पास बुलाया।

बँधी लकड़ियों को तोड़बाया।

पर लकड़ियां उनसे नहीं टूटी।

मिलकर  पाई  थी  मजबूती।

*****

जीवन के पास क्या मरहम है?

सुबह के वैभव को देखती हूँ तो खुशी गालों पर छलक़ने को आतुर होती है। ठीक उसी वक़्त कोई मध्धम सी सिसकी जो भीतर ही भीतर न जाने कबसे पल रही है आँखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। सिसकियाँ बेआवाज होती है, उन्हें भीड़ से डर लगता है। उन्हें आईने से भी डर लगता है। वे एकांत की फिराक में रहती हैं। वे फिराक में रहती हैं कि कब मैं भीड़ से तनिक हाथ छुड़ाऊँ और खुद के करीब आऊँ।

*****

फिर मिलेंगे।

 रवीन्द्र सिंह यादव 

 

 

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