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गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

4721 ..एक नब्बे वर्ष का जर्मन बूढ़ा चीनी भाषा सीख रहा था।

 सादर अभिवादन

आज के अक की रचनाएं..



"जब से न्यायालय का निर्णय आया है
मन पर उधेड़बुन का गहरा साया है
यह उधेड़बुन निर्णय पर नहीं,
नाम पर है क्योंकि नाम है 'इच्छा मृत्यु'"




नारियल की चटनी सी सादगी भरी बात,
सांभर की गर्माहट में अपनापन साथ।
केले के पत्ते पर सजा ये सादा सा स्वाद,
भीड़ भरी दुनिया में जैसे अपना सा संवाद।




शायद एक समंदर छुपाए थी, 
हम पढ़ते रहे केवल अंकों को, 
वो सिसकियाँ दबाए थी




मन वीणा की तान सुनी तो 
सुर ताल सजी बगिया महकी।
पवन बसंती के छूते ही 
आशा रूपी चिड़ियाँ चहकी।
ओढ़ चुनरिया बिंब रूप में 
निखरी कविता की तरुणाई॥ 




द्वारकाधीश मंदिर के समीप ही होटल था हमारा। नहा-धोकर हम श्री द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन के लिए निकल पड़े पर वहां बहुत भीड़ थी। लंबी-लंबी कतारें लगी थीं।
हम भी कतार में खड़े हो गए। यहां सुरक्षा के बहुत इंतजाम थे।आप कोई सामान अंदर नहीं ले जा सकते।मंदिर दूर से ही दिखाई दे रहा था।उसपर लहराता ध्वज सनातन धर्म की दिव्यता का संदेश दे रहा था। 
यहां पर दो द्वार हैं।स्वर्ग द्वार और मोक्ष द्वार।जब हम मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचे तो पता चला कि हम मोक्ष द्वार से अंदर आए हैं।तो स्वर्ग द्वार कहां है....?
पता करने ज्ञात हुआ कि स्वर्ग द्वार गोमती घाट के पास स्थित है और वहां छप्पन सीढ़ियां हैं जिनको पार कर मंदिर में प्रवेश किया जाता है




स्वामी रामतीर्थ  जापान गए। जिस जहाज पर वह थे, एक नब्बे वर्ष का जर्मन बूढ़ा चीनी भाषा सीख रहा था। अब चीनी भाषा सीखनी बहुत कठिन बात है। शायद मनुष्य की जितनी भाषाएं हैं, 
उनमें सबसे ज्यादा कठिन बात है। क्योंकि चीनी भाषा के कोई वर्णाक्षर नहीं होते, 
कोई क ख ग नहीं होता। वह तो चित्रों की भाषा है। इतने चित्रों को सीखना नब्बे वर्ष की उम्र में! 
अंदाजन किसी भी आदमी को दस वर्ष लग जाते हैं ठीक से चीनी भाषा सीखने में।


सादर समर्पित
सादर वंदन

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