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सोमवार, 20 अप्रैल 2026

4718 ..वह खाना इतना अच्छा बनाती थी कि उसके हिस्से में तारीफ़ आती थी

 सादर अभिवादन

सोमवार, 3 नवंबर 2025

4560 .." प्रेम में कसम तोड़ना पाप होता है " एक बार कहा था उसने

 सादर अभिवादन

सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

4532...सपने बड़े बड़े थे, साधन बहुत सीमित थे, पर रास्ता बड़ा कठिन था

 सादर नमस्कार

सोमवार, 22 सितंबर 2025

4519 ...बाऊजी, मैंने आपकी किताब्बें पढ़ी हैं। आप तो सब कुछ मेरेई बारे में लिखते हैं

सोमवार, 8 सितंबर 2025

4505 ...उदित हुआ सूर्यवंश का मान हमारा राम

सादर अभिवादन


जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है
जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है
जो रवि के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा
जो जीवन की आग जला कर आग बना है
फ़ौलादी पंजे फैलाए नाग बना है
जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है
जो युग के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा
-केदारनाथ अग्रवाल

चलिए आगे बढ़ें ....




देह में उकेरे हुए ज़ंजीरों के निशान,
पुकारते हैं अदृश्य महामानव
आग्नेय शब्दों में विस्मृत
स्वाधीनता के गान,
भग्न देवालयों के गर्भ -
गृहों में आज भी प्रज्वलित हैं शाश्वत मशाल,
सम्प्रति युग में भी हैं सक्रिय वही बर्बर
कौरवों के सन्तान, इतिकथाओं
के पृष्ठों से उतरता है समय
देह में उकेरे हुए ज़ंजीरों के निशान ।




राम नवमी
आया हर्ष का पल
सुखी अयोध्या
 
राम सा पुत्र
गर्वित रघुकुल
धन्य कौशल्या
 
राम सा सुत
दशरथ विभोर
धन्य रानियाँ
 
उदित हुआ
सूर्यवंश का मान
हमारा राम




शायद उनकी किसी अतिप्रिय अध्यापिका का नाम क्रिस्तीना होगा, जो कि बच्चों की मनपसंद टीचर होगी! अनजाने ही उसके हिस्से का प्यार मुझे मिल गया। बच्चे ऐसी ऊर्जा का स्रोत होते हैं कि जो निष्प्राण में भी तत्काल प्राण फूंक देते हैं, बस उसी ऊर्जा के आलिंगन के बाद से मन अधिक खिला खिला सा है। शिक्षक दिवस पर इस तरह उपहार स्वरूप बच्चों का साथ मिलना सबसे बड़ा उपहार हो गया।  






आवाज़ ढूंढती  है मुझे 
और मरे कानों को 
मैं छिपता फिरता 
भागता जा पहुचता हूँ 
कोलाहल में कहीं . 
सुनना नहीं चाहता 
अब और सबकी 
आवाजें 




"अरे, यहां भी कोई ठंड पड़ती है !" - हंसमुख बोला - “आप तो 60 बसंत देख चुके हो अपने जीवन के। 
ठंड में कभी अपने यहां बर्फ गिरते देखी है ?”

अब किसनू ठहरा साधारण ग्रामीण। गांव से बाहर कभी कदम नहीं रखा। इसीलिए वो तो यही मानकर चल रहा था कि उनके गाँव में तो क्या पूरे भारत देश में कहीं बर्फ गिरने का कोई सवाल नहीं। तो तपाक से बोल उठा - “अरे भइया! यहां कहां बर्फ गिरने लगी ? और जब गिरती ही नहीं तो मैं भला कहां देखने लगा बर्फ को गिरते हुए ?”

“सही कहा। अब आप ही बताओ जब यहाँ बर्फ ही नहीं गिरती तो ठंड क्या खाक पड़ेगी!”

“भई, कहना क्या चाहते हो ?” - एक तीसरा ग्रामीण रमैया बोला।

“अरे, अमेरिका में सिर्फ ठंड ही नहीं पड़ती। बर्फ भी गिरती है।”

“बर्फ भी गिरती है!” - जमनालाल, किसनू और रमैया तीनों एक साथ चौंके।

साथियों पर अपनी बात का प्रभाव देखकर हंसमुख उनको और अधिक हैरान करते हुए बोला - “अरे! सिर्फ बर्फ ही नहीं गिरती, बहुत ज्यादा बर्फ गिरती है। पूरे दिन बर्फ ही गिरती रहती है।”

“तू हमारी फिरकी तो नहीं ले रहा है लड़के!” - किसनू ने संदेह भरी नजरों से देखते हुए कहा।



आज बस
सादर वंदन



सोमवार, 29 जुलाई 2024

4201 ...साजिशों का बाजार है, सौदा करूं किसका

 नमस्कार

एक छोटी सी लम्बी कहानी
ऐसा है मेरा भारत...


जब हिटलर ने पोलैंड पर आक्रमण करके द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत की थी तो 
उस समय पोलैंड के सैनिकों ने अपने 500 महिलाओं और करीब 200 बच्चों को एक शिप में बैठाकर 
समुद्र में छोड़ दिया और कैप्टन से कहा की इन्हें किसी भी देश में ले जाओ, जहाँ इन्हें शरण मिल सके 
अगर जिन्दगी रही हम बचे रहे या ये बचे रहे तो दुबारा मिलेंगे।

500 शरणार्थी पोलिस महिलाओं और दो सौ बच्चों से भरा वो जहाज ईरान के सिराफ़ बंदरगाह पहुंचा, 
वहाँ किसी को शरण क्या उतरने की अनुमति तक नहीं मिली, फिर सेशेल्स में भी नहीं मिली, फिर 
अदन में भी अनुमति नहीं मिली। अंत में समुद्र में भटकता भटकता वो जहाज गुजरात के 
जामनगर के तट पर आया।

जामनगर के तत्कालीन महाराजा "जाम साहब दिग्विजय सिंह" ने न सिर्फ 500 महिलाओं बच्चों के लिए 
अपना एक राजमहल जिसे हवामहल कहते है वो रहने के लिए दिया बल्कि अपनी रियासत में 
बाला चढ़ी में सैनिक स्कूल में उन बच्चों की पढ़ाई लिखाई की व्यवस्था की। ये शरणार्थी जामनगर में 
कुल नौ साल रहे। उन्हीं शरणार्थी बच्चों में से एक बच्चा बाद में पोलैंड का प्रधानमंत्री भी बना 
आज भी हर साल उन शरणार्थियों के वंशज जामनगर आते है और अपने पूर्वजों को याद करते है।

पोलैंड की राजधानी वारसा में कई सड़कों का नाम महाराजा जाम साहब के नाम पर है, 
उनके नाम पर पोलैंड में कई योजनाएं चलती है। हर साल पोलैंड के अखबारों में 
महाराजा जाम साहब दिग्विजय सिंह के बारे में आर्टिकल छपता है। प्राचीन काल से भारत, 
वसुधैव कुटुम्बकम, सहिष्णुता का पाठ दुनिया को पढ़ाते आया है और 
आज कल के नौसिखिए नेता, भांड पत्रकार, मलेच्छ आदि लोग 
भारत की सहिष्णुता पर प्रश्न चिन्ह लगाते फिरते हैं।

जय जननी, जय भारतभूमि !!
अधिक जानकारी गूगल जी महाराज से लीजिए

अब आनंद लीजिए मिली-जुली रचनाओं का




जब नहीं होंगे उजाले,
आँखों पे जो ऐनक होगी,
झुर्रियों से भरा चेहरा..
न पहले सी रौनक होगी
हाँ सुनो....





मासूम भेड़ की ऊन
आधुनिक मशीनों से
उतारी जा रही है
भेड़ की असहमति
ठुकराई जा रही है
ज़बरन छीना जा रहा है  
सौम्य कोमल क़ुदरती कवच





बदल रहे हैं आजकल निसाब मौसमों के
सांस भी उलझ रहा, हिसाब मौसमों के,
ताल्लुक ग़र हमारा टूटे तो ये याद रखना-
गर्द-गर्द शहर की नुमाई हम ही,
जवाब मौसमों के।




साजिशों का बाजार है
सौदा करूं किसका
विधाता क्या
यही संसार है।।

कांटो पर चलना
आसान है दोस्तों यहां
फूलों से दर्द की
खुशबू आती



कल मस्त थे जिसके दल में
करने में गुणगान रे
पलभर में छोड़ चले सब
बेच दिया  ईमान रे
आओ - आओ, देर न करना
दल ,बदल के काम में



आज बस
कल श्वेता जी
सादर

सोमवार, 15 जुलाई 2024

4187..टाले न बान यह कभी टले, यह जान जाए तो ख़ूब जाए ।

 सादर अभिवादन

सुख का दिन डूबे डूबे जाए ।
तुमसे न सहज मन ऊब जाए ।

खुल जाए न मिली गाँठ मन की,
लुट जाए न उठी राशि धन की,
धुल जाए न आन शुभानन की,
सारा जग रूठे रूठ जाए ।

उलटी गति सीधी हो न भले,
प्रति जन की दाल गले न गले,
टाले न बान यह कभी टले,
यह जान जाए तो ख़ूब जाए ।
-निराला जी

चलें रचनाओं की ओर



मदद करने का मन होते हुये भी नहीं जाती क्योंकि नन्ही चिड़िया घबरा के उड़ जाती थी लगभग दस-बारह दिन बाद घोंसले में झाँका तो देखा वहाँ ज़िंदगी ने कदम रख दिये थे, अत्यंत छोटे मांस के लोथड़े से बच्चे नज़र आये । मैं दूर से देखती मादा और नर चिड़िया बारी-बारी से चोंच में छोटे कीट, पतंगे, इल्ली आदि दबा कर लाते और भूखे बच्चों के खुले मुँह में डाल देते




भरता नहीं मन,
कुछ पल की बातों में,
पास बैठे रहो यूं ही,
पल पल दिन रातों में
मिले इन पलों को
अब यूं न ग़वाओ।
कैसे कह दूं कि
तुम चले जाओ।




मैं पीड़ा का राजकुँवर हूं
तुम शहज़ादी रूप नगर की

हो भी गया प्यार हम में तो
बोलो मिलन कहां पर होगा ?





तुम भी वहाँ मौजूद नहीं थे
मेरा तो खैर सवाल ही नहीं उठता
पर हमारे ख्याल वहाँ मौजूद थे
पर हमने कभी ज़िरह की
ये सवाल ही नहीं उठता
हमारे मौन को शब्द मिले थे




…..और कुछ नहीं
वे स्वीकार्य-सीमा की मेड़ पर खड़े
गहरे स्पर्श करते अंकुरित भाव थे
न जाने कब बरसात का पानी पी कर
अस्वीकार्य हो गए
आह! ज़िंदगी लानत है तुझ पर
भुला देना  खेल तो नहीं

बस
कल सखी श्वेता से मिलिएगा
सादर वंदन

सोमवार, 24 जून 2024

4166 पत्नी से बड़ा कोई आलोचक नहीं होता

 सादर अभिवादन

मजबूर है तू भी
आदत से अपनी
अच्छी बातों में भी
तुझे छेद हजारों
नजर आ जायेंगे
 रचनाएँ कुछ मिली जुली ....



जेठ की तपती दोपहर में
बादलों का आना ही
राहत और सुकून देता है
और उनका बरस जाना
ज्यों तन-मन को भिगोता देता है
तुम आना तो वैसे ही आना
रूह में बस जाने को आना



अल्फाजों के मेरे छुआ लबों ने
जब तेरे मिल गये सब धाम l

अंतस फासले सिरहाने पाकीजा
अंकुश सिमट गये सब ध्यान ll

युग युगांतर साधना महकी जिस
सुन्दर क्षितिज सागर समर समाय l

नव यौवन लावण्य अंकुरन उदय
जैसे इनके रूहों बीच समाय ll




तन-मन झुलसाकर ख़ाक करती गर्मियों में
बादलों की अठखेलियाँ गिनते है
फूल काँटों संग झूमते हैं
भँवरे तितलियों संग ताल मिलाते हैं
गेहूँ और धान की बालियों से
हरे-भरे लहलहाते खेत
गाते किसान,





निष्पक्ष और सख़्त आलोचक
पत्नी जैसा हो  
आपके साथ हो  
तो निस्संदेह
कविता नज़र आयेगी





आना जाना,रस्म रिवाज रोज रोज की
रिवायतें औ बहाने सरेआम....बस करों,

मलंग मन,कस्तूरी सांसों मे घुल रही
जाते-जाते आँखों के इशारे..बस करों।





यूं तो हिंदी साहित्य में कविता लिखने वाले अनगिनत सितारे रहे हैं जिनकी कलम ने हर दौर में हिंदी को एक से बढ़कर एक बेहतरीन रचनाएं दीं। कविता हिंदी साहित्य की वो विधा है जो खूबसूरत से खूबसूरत विचार को कम शब्दों में कहना जानती है। 'गांव कनेक्शन' की साथी अनुलता राज नायर ने कोशिश की है ऐसी ही 10 बेहतरीन शख्सियतों को याद करने की, जिनकी कविताओं को साहित्य संसार सदियों तक याद रखेगा।




विदाई की बेला है
दुख तो स्वाभाविक है
नम होंगे नयन
जार-जार अश्रु भी बहेंगे
पर याद रखना होगा
हर अंत एक नयी शुरुआत है
हर रात का होता प्रभात है !




आज बस
कल मिलिएगा सखी से
सादर वंदन
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