सादर नमस्कार
आ रही है
दीपावली
फिर से
फिर से क्या,
उसे तो आनी है
बच्चे रोक लेंगे
मेरी खुशियां,
मेरे सपने
मेरे बच्चे,
मेरे अपने
यह करते-करते
शाम हुई
इससे पहले
तम छा जाए
इससे पहले कि
शाम ढले
चलिए चलें रोकने
“तुम हर महीने सफाई क्यों नहीं कर देते हो! साल भर पर भी तुम्हारे पीछे लगना पड़ता है तो होती है यह भी सफाई। मैं अकेली कैसे करूँ! बेटी-बहू होती तो बीच-बीच में होता रहता।”
“आप जैसे भी हैं, बहुत अच्छे से हैं! है न एक और घर जहाँ काम करता हूँ। उनकी बहू के आँखों में जरा पानी नहीं है। सिर्फ़ अपने लिए खाना बनाती है। सास, पति और उसकी बेटी के लिए मैं बनाता हूँ।
तरसती हूँ बचपन की धरती ।
जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥
धर्म न था तब कोई बँटवारा ।
सबको मानें एक ही धारा ॥
दिवाली की मिठाई मिलती ।
ईद की सेवइयां भी खिलती ॥
मेरे सपने आकार ले रहे थे
मैं ज़िन्दगी में वापसी कर रही थी
सबकुछ पटरी पर आ गया
हाँ कठिनाइयाँ तो ज़रूर आयी पर
सफलता ने हमारे कदम चूमे
और मेरा वो सपना जो
मैंने बचपन में देखा था
धीरे - धीरे पूरा हो रहा है।
सचिन अपने दादा पर ज्यादा गया है, जीव प्रेम की ऐसी ही कहानी मेरे पिताजी की भी रही, ठेठ पहाड़ी परिवेस में पिताजी के जीवन का अभिन्न हिस्सा झंवर्या बैल था जिसकी समाधी पर पिताजी ने बुराँस का पौधा रोपा था, उस जीव प्रेम कहानी को मैने ‘बंसत के बाद का बुराँस के फूल’ शिर्षक से हिन्दी व गढ़वाली में उधृत किया है।
आज बस
फिर मिलते हैं न


