सादर अभिवादन
जयमाता की
आज से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत
आज ही महाराजा अग्रसेन जी की जयंती है
आज से ठीक दसवें दिन दशहरा है
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चन्द लफ़्ज़ों ने घायल किया है उसे,
खुरदरी राह पर जो न अब तक छिला.
पेड़ टूटा जहाँ घास थी जस-की-तस,
जिसकी गरदन थी ऊँची वो जड़ से हिला.
बहुत पीड़ा होती है
जब मैं कहती हूँ—
बरगद पौधे नहीं पनपने देता,
उसकी छाँव विचार निगल जाती है,
और उसके फैसले
अहंकार की कोख में
अजन्मे मर जाते हैं।
उनकी दीवारें ऊँची नहीं,
बस कैदखाने हैं।
जो मैंने देखा, तुमने देखा,
सारी दुनिया ने देखा !
तो फर्क कहाँ रहा
उसके या हमारे सपनों के संसार में,
सपनों के आकार में,
और सपनों के साकार होने के
उपक्रम में ?
कोई बता दे मुझे !
किंतु अब जाके पता चला कि
तांडव-वांडव कुछ नहीं ,
विकास-ए-परती धरा ये,
स्वर्ग वालों को खटी जा रही,
ये तो "ऋतु बरसात' इक बहाना था
बादल फटने का,
नु पता आपरेशन सिंदूर देख,
इंद्रदेव की भी फटी जा रही।
छप्पन-इंची सीने में रख,
अध्यात्मवाद का उजियार।
जनमानस के उर में रहते,
शुद्ध रखे अपना आचार।।
संकट को अवसर में बदलें,
करते सबसे मन की बात
विश्व-गुरु पहचान बनाने,
योग-दिवस का दें उपहार।।
नयन बोलते रह गए मन की अंगनाई में
तारे भी हँस पड़े अम्बर की अमराई में ।
शब्दों ने यूँ वल्गा लहराई न होती
वफ़ा की यूँ कभी रुसवाई न होती ।।
“सलाम बरमा जी।” दुकानदार ने मुझे देखकर अपने दायें हाथ से माथा झटका तो मुझे लगा कि
बैंक का कोई ग्राहक होगा इसलिये मेरा नाम जानता है।
“देक्खा बरमा जी, बताओ तो सही, मैंने कैसे पैचाणा आपको?”
“बैंक में देखा होगा ... एक कप चाय दो, एकदम कड़क।“
“एक चाय लगा बाबूजी को, पेशल मेहमानों वाली, दुकान के खाते में” कारीगर को
चाय का ऑर्डर देकर वह फिर मुझसे मुखातिब हुआ, “बाऊजी, मैंने आपकी किताब्बें पढ़ी हैं।
आप तो सब कुछ मेरेई बारे में लिखते हैं।”
आज बस
सादर वंदन



