सादर अभिवादन
आज मेरे जीभ में छाले से जलन हो रही है
कल सिमई खा लिया था उसका तो नही
आज के इस अंक में दो रचनाएं
साहित्यिक पत्रिका साहित्य कुंज से है
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ये बात और है कि वो बेवफ़ा हैं
बेगैरत हैं हम तो, उम्मीद तो रखेंगे
कहते हैं हमसे कि हम ना मिलेंगे
मिल के भी हम तो मर ही मिटेंगे
अब तो “वर्मा”
बस इसी फ़िराक में है—
कि ये किस्से
उन तक भी पहुँचें…
और जब पहुँचें—
तो एक सच बन जाएँ।
ताकि ये किस्सा…
सिर्फ किस्सा न रहे।
वाणी अटकी, बोल न फूटे
अंतर का चैन कोई लूटे,
कविता दिल की भाषा जाने
कितने कूल-किनारे छूटे !
रागी मन बनता अनुरागी
भीतर कैसी पीड़ा जागी,
पलकों में पुतली सा सहेजे
भीतर लपट लगन की लागी !
अमित ने दस रुपये की चाय ली। सौ का नोट पकड़ा दिया।
वेंडर ने जल्दी में अपनी बरसाती जेब टटोली, खुले नोट निकाले और अमित को पकड़ा दिए,
“गिन लीजिए साहब।”
अमित नोट गिनने लगा। तभी उसे पता लगा कि उसने दस-दस के तीन नोट और
एक उसी का सौ का नोट वापस कर दिया था। शायद हड़बड़ी में पचास का नोट नहीं निकाल पाया और
सौ का ही पकड़ा दिया।
“साहब, दस रुपये और नहीं हैं . . .
आप एक चाय और ले लीजिए साहब। अभी ट्रेन चलने वाली है,
नहीं तो मैं बाहर से ही खुल्ले कराकर ले आता . . .”
स्मरण हैं मुझे अब भी वो क्षण
जब समेट लिया था तुमने
मेरा प्रेम अपनी मुट्ठियों में
कुछ इसी प्रकार रक्ताभ हो उठी थीं ऋतुएँ
मेरे चारों ओर बिखर गया था
प्रेम का लाल रंग
सादर समर्पित
सादर वंदन


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