सादर अभिवादन
अगले शनिवार को शायद सिमई बनेगी
पता नही क्य़ूं
रचनाएं की ओर चलें...
पता नही क्य़ूं
रचनाएं की ओर चलें...
कोरे कागज की निःशब्द
भाषा टकटकी
बाँधे कुछ लिखने को कहती है
सुख - दुख , आशा - निराशा
राग - विराग , तृष्णा और तोष
कट ही जाएगी, ये जिंदगी....
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!
रेत में लिपटी, लंबी ठंड सी रात में,
इस धूप में, उन उम्मीदों की बरसात में,
अनबुझ से, जज्बात में,
तेरी चुप-चुप सी, हर बात में!
जीवन मिल सके सबको, इसलिए
तुम्हें जीते जी मरते देखा है।
तुमने ही तो दी है सबको,
आज जो परिवारों की रूपरेखा है।
कौन हो तुम कब से सोच रहे हो,
सुनो! वही मर्द है ये,
जिसे तुमने हर रोज शीशे में देखा है।
एक समय था
जब हिन्दू
ब्राह्मण राजा
रावण से
अपनी पत्नी को छुड़ाने
के लिए
वनवासी राम को
लंका पर चढ़ाई
करनी पड़ी
संतोषी अंतर मन
पुलकित हो गात सदा,
जीवन को खेल समझ
बढ़ती हो बात सदा !
विराग ना राग रहे
अनुराग बहे भीतर,
उन्माद पिघल जाये
बस जाग रहे भीतर !
बुद्धिमान गदहा
व्यापारी ने एक नहीं मानी।
हारकर धोबी ने व्यपारी को
अपना गदहा दे दिया।
गदहे को अपने मालिक की
विवशता देखी नहीं जा रही थी।
सोचा व्यपारी के साथ ना जाए।
पर नहीं जाने से भी
उसके मालिक को पर
सादर समर्पित
सादर वंदन



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