शीर्षक पंक्ति: आदरणीय दिग्विजय अग्रवाल जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
शुक्रवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
जब प्रिया ने बताया कि वह कोटा से है तो कहने लगे, “बिटिया आप तो हमारी भतीजी हुई, कोटा और हमारा गाँव दोनों
चम्बल किनारे हैं, बस पचास किलोमीटर की दूरी है.” उन्होंने थाली के पैसे लेने
से भी इन्कार कर दिया. “आज पैसे नहीं लूंगा, फिर कभी आओगी तब देखूंगा.” रामजी ने खुद को प्रिया का
चाचा घोषित कर दिया. कहने लगे, “बिटिया आते रहना अच्छा लगेगा.” रामजी ने उससे पैसे नहीं ही
लिए. इतनी दूर ऐसा अपनापन देख उसकी आँखें नम हो गईं.
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सौरभ की मां को जरूर उसके बारे में सब कुछ पता था। लेकिन उन्होंने कभी सौरभ के पिता को इस बारे मे कुछ नहीं बताया था और आगे भी बताने का कोई इरादा नहीं रखती थी।
अब जबकि पूरे तीन साल बाद सौरभ लौटकर शहर वापस आ चुका था, तब सौरभ की मां को लगा कि शायद अब वह अपना अतीत भूल चुका होगा और एक नई शुरुआत करने के लिए वह वापस आया है।
लेकिन उसने तो पहले ही दिन अपनी मां के विचारों को गलत साबित कर दिया था।
हमने तो ज़िन्दगी को बड़े करीब से देखा
है
शायद इतनी खूबसूरत मुस्कान भी न होती
सुंदर संयोजन
जवाब देंहटाएंआभार
सादर