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गुरुवार, 12 मार्च 2026

4679 धूप पड़ी, लहरें चमकीं उसकी लाचारी प्रतिभा घोषित हो गई।

 सादर अभिवादन 

आज पम्मी जी नहीं है
शायद भूल गई
चलिए चलें 
आज की ताजी रचनाएं देखें



तुम चाहो मैं ध्यान करूँ 
मैं चाहूँ उड़ान भरूँ 
तुम चाहो मैं घर में बैठूँ 
मुझे नापनी दुनिया सारी

जीवन का निचोड़ यही है 
तू-तू मैं-मैं होगी ही 
गले मिलने से विचार मिलेंगे 
सोच है बिलकुल बचकानी





कली क्या करती है फूल बनने के लिए
विशालकाय हाथी ने क्या किया
निज आकार हेतु
व्हेल तैरती है जल में टनों भार लिए
वृक्ष छूने लगते हैं गगन अनायास
आदमी क्यों बौना हुआ है





कभी भी न सिमटने वाला 
सन्नाटा.., 
फासला तो अधिक नहीं है 
हमारे बीच
मगर सोचों  की गहराई का 
छोर..,




एक मछली थी—
उसे तैरना नहीं आता था।
वह धारा के साथ
बस बह रही थी।

धूप पड़ी,
लहरें चमकीं—
और उसकी लाचारी
प्रतिभा घोषित हो गई।





“हाँ पापा, मेरे आते ही मेहमानों के आने का उल्लेख चल निकला और मैं यह पत्र और आप सबको बता नहीं पायी. मेरी नियुक्ति बनस्थली विद्यापीठ में टीचिंग असिस्टेंट के पद पर हो गयी है. मैं इसके साथ ही एम.एससी. और पीएचडी कर सकती हूँ. बल्कि अपना खर्च उठाने के साथ ही कुछ बचा भी सकती हूँ.”

गुप्ताजी की आँखें सजल हो गयी थीं. गुप्ता जी ने पास बैठी शगुन को अपनी छाती से लगा लिया. 
अब शगुन की आँखें भी छलकने को थीं.


बस
फिर मिलूंगा

1 टिप्पणी:

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