सादर अभिवादन
कल अष्टमी थी
आज रामनवमी है
और मार्च मास की विदाई
इस मार्च में, अप्रैल मास में होने वाले उत्सव
इन दो-तीन दिनो ं सम्पन्न हो गया
और मार्च मास की विदाई
इस मार्च में, अप्रैल मास में होने वाले उत्सव
इन दो-तीन दिनो ं सम्पन्न हो गया
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फ्लैट फर्निश्ड था लेकिन कुछ ज़रूरी बर्तन, बेड के लिए चादर, तकिए के गिलाफ और कुछ किराना के सामान वह ले आई थी. पहली रात उसने खुद के लिए चाय बनाई. वह सोच रही थी कि उसे अपनी जरूरतों के लिए जो सामान चाहिए सुबह उनकी लिस्ट बनानी पड़ेगी. जिससे सप्ताहांत के इन दो दिनों में सारा जरूरी सामान खरीद ले. उसने सोने की कोशिश की लेकिन सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी ही सांसें सुनाई दे रही थीं. उसने उठ कर खिड़की से बाहर देखा, जहाँ मुम्बई कभी नहीं सोती. उसे समझ आया कि आज़ादी की सबसे बड़ी चुनौती 'अकेलापन' है. तभी फोन पर आकाश का मैसेज चमका— "फ्लैट कैसा है? तान्या कह रही है कि अब वह अपनी छुट्टियाँ मुम्बई में दीदी के साथ ही बिताएगी."
मैसेज पढ़कर प्रिया के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई. उसने महसूस किया कि वह एक साथ दो लड़ाइयाँ लड़ रही है—एक बाहर की दुनिया से और दूसरी अपने ही परिवार के प्रति उपजे उस 'अविश्वास' से, जो उसे अपनी ही जड़ों से दूर कर रहा था.
“अरे, इतनी भी चिंता क्यों कर रहे हो उपले भाई ! मैं हूँ ना चिर युवा ! मेरे होते तुम पर कोई आँच नहीं आएगी ! तुम्हारी साज सजावट तो सिर्फ इसलिए है कि घर में ब्याह शादी हो तो सारे बारातियों को
सज धज के तैयार रहना चाहिए ! न जाने किसकी पुकार लग जाए ! तुम चिंता न करो ! मेरे होते तुम्हारी शहादत की ज़रुरत नहीं पड़ेगी इसका भरोसा है मुझे !”
तसल्ली देती यह आवाज़ थी इन्डक्शन चूल्हे की!
मन पूछता है
क्या सच में हम
इतने बेबस हैं?
शायद, हमारे भीतर का मनुष्य
धीरे-धीरे म्यूट हो रहा है,
पर फिर,
एक छोटी-सी,
शर्मिंदगी से भीगी उम्मीद
कहती है कि स्ट्रैट ऑफ़ होरमुज़ से
हमारे हिस्से के तेल-गैस के जहाज़
सही-सलामत आ जाएँ…
एक जादू तुमको दिखलाये
डालो बीज पेड़ बनेगा
हरा - भरा यह बाग़ बनेगा
जब तुम इसको देखोगे
हंसी - ख़ुशी तुम गाओगे
पेड़ को दोस्त बनाओगे
होश है या कोई ख़ुमारी है?
है सुकूँ या कि बेक़रारी है?
तेरा होना अजाब था दिल पे,
तू नहीं तब भी दिल ये भारी है|
रतजगे बन गए नसीब उनका,
वस्ल में शब जो इक गुजारी है|
सादर समर्पित
सादर वंदन

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