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शनिवार, 7 मार्च 2026

4674 ...एक बीज की स्वतंत्रता, जमीन के अंधेरे में खो जाती है

सादर अभिवादन 

रंग अबीर
रंगरेज ने डारे
धरा सुखाती !

गेंहू की बाली
फूली पीली सरसों
बसंत आया


श्वेत कपास
सा उड़ता बादल
घेरे है घटा ! 
-सदा

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"शांति" हमेशा "युद्ध"
से बेहतर है! इस बात से 
कौन कौन सहमत है।



एक बीज की स्वतंत्रता,
जमीन के अंधेरे में खो जाती है,
मिट्टी की चुप तहों में उसकी
पहली सांस ही सो जाती है।
वह अकेला है —
पर हार मानना उसे आता नहीं,





ये तुम्हारा भरम है कि वे गुलाब रक्खेंगे
मंजिल से ठीक पहले वे सैलाब रक्खेंगे

हकीकत कही तुमसे रूबरू न हो जाये
तुम्हारे पलको पर अब वे ख्वाब रक्खेंगे
  
औंधे पडे मिलेंगे तुम्हारे सवालो  के तेवर
चाशनी से लिपटे जब वे जवाब रक्खेंगे



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सजनी   को   कैसे  फबे,होली  का  त्योहार।
बैठे   हों  जब  साजना, सात  समुंदर  पार।।

है  बस  इतनी  कामना, होली  पर  हर बार।
करें  सभी  अपनत्व  के, रंगों  की  बौछार।।




लालसा उस बौर की 
अमिया की डाली पर 
पल्लवित-पुष्पित होती। 
नाहक था इंतजार 
छोटी-छोटी अमिया !
लू चलती
हवाओं के थपेड़े में 
नंग-धडंग, पेड़ की छाँव में 
बैठे हम। 
गमछे की पोटली से निकालता 'रमुआ'
नमक,मिर्च की पुड़िया,
छील रहा था 'काका'
अमिया को,
तालाब से निकले उस सीप के 
चाकू से,

सादर वंदन

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