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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

4694...उस अनचाही युद्ध की दास्तां...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय दिग्विजय अग्रवाल जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

शुक्रवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

101-युद्ध के आखिर में जला

आने वाली पीढ़ियों को सुनाओगे

सदियों तक,

उस अनचाही युद्ध की दास्तां

जो कभी नहीं चाही थी,

उस जली हुई जमीन ने,

सड़े हुए जवान जिस्मों ने,

और एक उजड़ी हुई सभ्यता ने,

*****

परछाइयाँ

जब प्रिया ने बताया कि वह कोटा से है तो कहने लगे, “बिटिया आप तो हमारी भतीजी हुई, कोटा और हमारा गाँव दोनों चम्बल किनारे हैं, बस पचास किलोमीटर की दूरी है.उन्होंने थाली के पैसे लेने से भी इन्कार कर दिया. आज पैसे नहीं लूंगा, फिर कभी आओगी तब देखूंगा.रामजी ने खुद को प्रिया का चाचा घोषित कर दिया. कहने लगे, “बिटिया आते रहना अच्छा लगेगा.रामजी ने उससे पैसे नहीं ही लिए. इतनी दूर ऐसा अपनापन देख उसकी आँखें नम हो गईं.

*****

 उस बारिश के बाद-11

सौरभ की मां को जरूर उसके बारे में सब कुछ पता था। लेकिन उन्होंने कभी सौरभ के पिता को इस बारे मे कुछ नहीं बताया था और आगे भी बताने का कोई इरादा नहीं रखती थी।

अब जबकि पूरे तीन साल बाद सौरभ लौटकर शहर वापस आ चुका थातब सौरभ की मां को लगा कि शायद अब वह अपना अतीत भूल चुका होगा और एक नई शुरुआत करने के लिए वह वापस आया है।

लेकिन उसने तो पहले ही दिन अपनी मां के विचारों को गलत साबित कर दिया था।

*****

तीखे बोल-(लघुकथा)

सोनाक्षी को समझते देर नहीं लगी- यह फिकरे किस पर......।
उसका दिल लहूलुहान........।
 मन में संकल्प लिया- "चाहे जो हो, अब कभी भी इनके बच्चों की ........।"
      ईश्वर ने जल्द ही वह दिन दिखा दिया। अर्चना की जेठानी जी स्वर्ग सिधार........।
गाँव जाना भी आवश्यक है और बच्चों की छह माही परीक्षा ........।
अब न अर्चना जी को ही मुँह रहा कि बच्चों की देखभाल की...........।
 न ही सोनाक्षी का मन...........।

*****

कठिनाई

हमने तो ज़िन्दगी को बड़े करीब से देखा है 

हर मुश्किल को लड़कर जीता है 

हर मुश्किल से एक नया सबक सीखा 

आज ऐसा लगता है कि 

अगर ये मुश्किलें न होती तो 

शायद इतनी खूबसूरत मुस्कान भी न होती 

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


2 टिप्‍पणियां:

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