सादर अभिवादन
है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।
गुण बड़े एक से एक प्रखर,
हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,
वर्तिका-बीच उजियाली हो।
बत्ती जो नहीं जलाता है
रोशनी नहीं वह पाता है
-रामधारी सिंह दिनकर
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रामदीन ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया था। तुमने कहा था, “देखो न दीदी। उसकी मुस्कान में जवाब नहीं,
बस धैर्य है! बच्चों को कौन समझा सकता है कि ऐसा ही यह गुब्बारा उसके बीमार पोते की जिद है,”
“हाँ, उसका पोता, जिसकी खाँसी रातों को दीवारों से टकराती रहती है। चिकित्सक ने दवाइयाँ दी है।
पर बच्चे ने दादा से कहा था, -‘दादा, बड़ा वाला गुब्बारा लाना, आसमान जितना।’ मैंने कहा था और
रामदीन बुदबुदा रहा था—“क्या आसमान खरीदा जा सकता है?”
जिस दिन
जज़्बातों का द्रव्यमान बढ़ेगा,
और अहंकार की दूरियाँ घटेंगी,
उस दिन
वो भी महसूस करेगा
तुम्हारी ओर खिंचती हुई
अपने दिल की कक्षा।
क्योंकि प्रेम
कोई चमत्कार नहीं—
यह भी प्रकृति का नियम है।
किला जैसलमेर का ! सन 1156 में भाटी शासक रावल जैसल ने इस ऐतिहासिक किले की त्रिकूट पहाड़ी पर बहुत सोच-समझ कर और रणनीतिक दृष्टिकोण को सामने रखते हुए नींव रखी थी। उनके वंशजों ने यहाँ रहते हुए, भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक, बिना वंश क्रम को भंग किए हुए लगातार 770 वर्ष तक शासन किया, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण कीर्तिमान है ! भाटी वंश स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के यादव वंश से जोड़ता है ! इस गौरवपूर्ण परंपरा का उल्लेख प्रचलित लोककथाओं में, शिलालेखों के साथ-साथ राजवंश के वृतांतों में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।
असंख्य बसंत गुज़रे छू कर
इस झूलते दालान को,
अनगिनत बार
देखा है
लड़खड़ाते सूरज के अवसान
को, उड़ान पुलों की रफ़्तार
रुक जाती है आधी रात,
कोई याद नहीं
करता
आज का ये अंक
फरवरी का अंतिम अंक है
सादर वंदन

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