शीर्षक पंक्ति: आदरणीय जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में पढ़िए पसंदीदा रचनाएँ-
सूरज ढला है तो फिर सुबह भी आएगी ही
भटके हुए राही भी अक्सर थककर लौट आते हैं,
जब ठोकरों का दर्द उन्हें अपनी जड़ों की याद
दिलाता है।
दुआओं में असर रखना, यही अब तुम्हारा काम है,
भले
रास्ता आज कठिन और बदनाम है।
*****
देवालय के द्वार कभी बंद
नहीं होते, ज़रूरी है
सही समय उस
गंतव्य पर
पहुंच पाना,
जो ज़ख़्म पे मरहम हो, शफ़ा हो शुकून हो ये वो नहीं है घर, तू कहीं और चला जा। खुदगर्ज़ बस्तियों में फ़रेबों के मकाँ हैं 'उनका' है ये शहर तू कहीं और चला जा।
" रिंग किसने चुरायी होगी ?....अभय रिचा को नुकसान पहुंचाना चाहता था....क्यों ? ....कहीं ऐसा तो नहीं कि वह भी रिचा से प्यार करता
हो ?....और सौरभ ?....एक ऐसा शख्स , जिसे किताबों के अलावा किसी से कोई मतलब नहीं रहता , उसको रिचा की इतनी फिक्र क्यों थी ? "
*****
उनके
हिस्से चुपड़ी रोटी ------
र लुटाया है मौसम ने जी भरकर इस पर अपना,
ऐसे ही थोड़ी धरती की चूनर धानी-धानी है।
फ़स्ल हुई चौपट
बारिश से और धेला भी पास नहीं,
कैसे क़र्ज़ चुके बनिये का मुश्किल में रमज़ानी है।
*****
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
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