।।प्रातःवंदन।।
ऊषे!
यह रवि का प्रकाश जो
तेरे श्रम का ही है प्रतिफल!
ये अलग-अलग बिखरे
एकाकी प्रकाश-बिन्दू
तम के असीम सिन्धु में
करते झिलमिल
जिन्हें जगती के मानवगण!
कहते हैं तारकगण!
विजयदान देथा 'बिज्जी'
चलिए आज की प्रस्तुति की ओर ..
ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे
दिल का दरवाजा रोज़ खटखटाया ना करो
अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो ।
तुम्हारी यादों में भूली ज़माना और ख़ुद को
तेरे सिवा ना अपनाया अभी तक किसी को
ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे
कितना चाहा तुझे था बता न पाई तुझी को..
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कुछ भी तो नहीं पता हमें
न कभी हो सकता है
क्यों और किसने बनायी यह दुनिया ?
बस मन उस जादूगर के
प्रेम में खो सकता है !
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नई विधा - जो दोनों ओर से पढ़ी जा सके
झीना था प्रतिरूप तुम्हारा, छीना था हर चैन हमारा
अच्छा था मोहक था खेल, सच्चा था रोचक था मेल
करते रहे तुम्हें हम दूर, कहते रहे तुम्हें हम हूर..
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रिश्ता बहुत पुराना, यादें पुरानी दे दो
धरती तरस रही है, कुछ तो निशानी दे दो
पिघलो जरा ऐ बादल, रोना शुरू करो तुम
प्यासी धरा पे सबकी, आँखों में पानी दे दो..
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पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
सुंदर अंक परोसा है आपने
जवाब देंहटाएंसादर वंदन