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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

4652....अबंर तक उड़ जायेंगे..

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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बीज से वृक्ष 
तक का संघर्ष  
माटी की कोख से 
फूटना
पनपना,हरियाना,
फलना-फूलना
सूखना-झरना 
पतझड़ से मधुमास
सौंदर्य से जर्जरता के मध्य
स्पंदन से निर्जीवता के मध्य
सार्थकता से निर्रथकता के मध्य
प्रकृति हो या जीव
जग के महासमर में
प्रत्येक क्षण
परिस्थितियों के अधीन
जन्म से मृत्यु तक
जीवन के
मायाजाल में उलझी है
जिजीविषा...।
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आज की रचनाऍं- 
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ओरे-बोरे दर्द छुपाया
आँसू कथरी-कथरी 
टांका बस पैबंद उम्र भर
भटका नगरी-नगरी
कमी नहीं कोई पाओगे
मेरे चहल-पहल में





जीवन बिखरा है 

प्रकृति का हास बनकर

आदमी ने बंद कर लिए हैं अपने कान 

या भर लिए हैं मशीनों की आवाज़ों से 

अथवा तेज फूहड़ संगीत से 




साँसों के इस कोमल घर में, हम दो ज्योति समाएँगे,
अंग-राग की इस सीमा से, अंबर तक उड़ जाएँगे,
जब लय-प्रलय की इस संधि पर, काल स्वयं थम जाएगा,
तब प्रेम-समर्पण का यह क्षण, युग-युगांतर कहलाएगा!
अभी यहाँ यह रूप-झलक है, वहाँ अमित अनुराग रहेगा!



समंदर ने पानी उधार लिया है 

नदियों से 

नदियां जब सूख रही होती हैं 

समंदर नहीं लौटता है

नदियों के हिस्से का जल ! 



शाम को जब सूरज ढल रहा था, आयुष और शगुन छत पर मिले. "चाची भी लड़की चाहती हैं, आयुष," शगुन ने कहा. "पर चाचा को 'वारिस' चाहिए," आयुष ने मुंडेर पर हाथ रखते हुए कहा. "2006 आ गया है, पर सोच अब भी 1906 में अटकी पड़ी है. हम कुछ बनने के लिए कोटा और बनस्थली जा रहे हैं, पर क्या हम वाकई इस पिंजरे से बाहर निकल पाएंगे?"




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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. जन्म से मृत्यु तक
    जीवन के
    मायाजाल में उलझी है
    जिजीविषा...।
    बेहतरीन अंक दिया है आज
    आभार
    सादर वंदन

    जवाब देंहटाएं

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