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सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

4662 ..देश अलग हैं, देश अलग हों, वेश अलग है, वेश अलग हों,

 सादर अभिवादन 


देश अलग हैं, देश अलग हों, 
वेश अलग है, वेश अलग हों, 



मानव का मानव से लेकिन 
अलग न अंतर-प्राण।
भूल गया है क्यों इंसान!

-हरिवंश राय बच्चन


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मर का तो अंजाम आएगा

होगा मेरे ही नाम जो बे-नाम आएगा.

ख़ुशबू के साथ उड़ के जो पैग़ाम आएगा.


यादों का सिलसिला तो नहीं आता पूछ कर,

ऐसे ही दिल में तू कभी गुमनाम आएगा.


कालिख का वृत्त



अब वह

रास्तों की धूल में नहीं,

धूल की स्मृति में है

जहाँ

हर घुमाव

मिट्टी से मिलकर

अपना पहला हरापन

धीरे से दोहराता है।



दिन भी हुआ धुआँ-धुआँ



रहबर ही जब न मुल्क में छोड़ें कोई कसर,

पहने हुए हैं जिस्म पे सब काग़ज़ी लिबास।


फूँका किए हैं दूसरों के घर जो अब तलक,

अब अपने ही मकाँ का नहीं होता है अभास।




आया बसंत



सरसों फूल

पीले परिधान में

सजती धरा।


ले कुसुम

उमंग की बहार

राग बसंत।



ढलने लगी ये सांझ



वो जब मिले तो यूँ मिले इक ख्वाब की तरह,

दिल के मचलते प्यार में तूफाँ जगा दिया ।


लेकिन तू मुझको ये बता, मुझसे था क्या गिला,

इन साजिशों के शोलों में, दिल तक जला दिया ।



आसपास फूलों की गंध को सजाएँ



मुँह मीठे 

पान भरे 

काशी क्या बोले,

गंगा की 

गठरी की 

गांठ कौन खोले,

घाटों पर 

बँधी हुई

नाव को सजाएँ.


ससुराल का कर्ज


जिस बहू के मायके जाने पर उसकी सास और ननद उसके बैग की तलाशी लेती थीं और उसे 'गरीब घर की' कहकर ताना मारती थीं, उसी बहू के बैग से एक दिन कुछ ऐसा निकला कि पूरे ससुराल की बोलती हमेशा के लिए बंद हो गई।

गरिमा जब भी अपने मायके जाने के लिए तैयार होती, तो उसके पेट में एक अजीब सी मरोड़ उठने लगती थी। यह डर मायके जाने का नहीं था, बल्कि वहां से लौटने पर होने वाली ‘अग्निपरीक्षा’ का था।

“बहु, बैग इधर लाओ,” सासू माँ, सुमित्रा देवी, सोफे पर पैर पसारकर हुकुम चलातीं।

गरिमा चुपचाप अपना बैग मेज पर रख देती।

सुमित्रा देवी की गिद्ध जैसी नज़रें बैग के एक-एक कोने को टटोलतीं। कभी वो साड़ियों की तह खोलकर देखतीं, तो कभी क्रीम-पाउडर के डिब्बे हिलाकर।



ससुराल का कर्ज, 

ये कथा फेसबुक के ब्लॉग की रचना है, इसी  एक रीडिंग लिस्ट को बुकमार्क में रखें





आज का ये अंक

भी झेलनीय है

सादर वंदन


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