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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

4659...एक पुराना,सच्चा दर्द खो गया है...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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गलत होकर ख़ुद को सही साबित करना उतना मुश्किल नहीं होता जितना सही होकर ख़ुद को सही साबित करना।

संकेत की भाषा पढ़ने के लिए दृष्टिभ्रम से बाहर निकलना होगा वरना हम जो देखना चाहते हैं वही देखने के प्रयास में उलझे रह जायेंगे....।


आज की रचनाऍं- 
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मैं अपने
नैसर्गिक दर्द के साथ
जीना चाहता था।

थाने गया
उन्होंने कहा,
पहले सबूत लाओ
कि दर्द तुम्हारा ही था।

अख़बार में इश्तेहार दिया
एक पुरानासच्चा दर्द खो गया है,
पाने वाला कृपया लौटा दे।

टीवी वालों से कहा
उन्होंने पूछा,
इसमें टीआरपी कितनी है?”




इस एक जुदाई ने कितना मजबूर कर दिया

लिपट गया वी मुझसे कफ़न की तरह,


मैं देखता रह गया पुराने आँगन की तरह

और तू जुदा हो गयी दुल्हन की तरह,






एक अनंत स्रोत है जिससे

नित नवीन भाव जगते हैं,

पल भर कोई थम जाता जब

अमृत घट बरबस बहते हैं !

 

शब्द उसी के भाव उसी के

जाने क्या रचना वह चाहे,

कलम हाथ में कोरा कागज

सहज गीत इक रचता जाये !




नील व्योम की विशाल वक्ष सा
है अगाध विश्वास भरा मन
सहज सुभग अनुराग भरा 
है साँसो का कोमल स्पंदन।
इकतीस वर्ष के पावन संग का
अनगिनत ही एहसास लिए 




"क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?" फातिमा ने पूछा और सीमा के पास ही शगुन के बिस्तर पर बैठ गई. "आज डॉ. शास्त्री ने जो कहा, उसने मुझे डरा दिया शगुन. अगर 'स्टीरियोटाइप्स' ही हमारी पहचान तय करते हैं, तो क्या फातिमा होना हमेशा एक संदेह के दायरे में रहना ही रहेगा? प्रियंका का आज मेस से भागना... क्या वह भी इसी स्टीरियोटाइप का हिस्सा था कि वह हमारे साथ बैठकर 'अशुद्ध' नहीं होना चाहती?"




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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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