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रविवार, 8 फ़रवरी 2026

4647...सुख सार्वजनिक है दुख निजी...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया पूनम चौधरी जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

समुद्री यात्रा

अब सुनो,

हम सागर की बात कर रहे थे

सागर में तैर रहा है एक जहाज़

जहाज़ पर हज़ारों लोग

लोगों में एक परिवार

जिनके मध्य बहता है प्यार

*****

पितामाँ और रोने की भाषा/ डॉ. पूनम चौधरी

पिता कहते थे

पुरुष अगर रोए

तो समय को असहज कर देता है,

और समय

कभी भी असहज पुरुषों को माफ़ नहीं करता।

उन्होंने सिखाया,

सुख सार्वजनिक है दुख निजी

*****

पापा अब ठीक हो रहे हैं

अब पापा ठीक हो रहे हैं। घर आ गए हैं। बड़ी मुसीबत आई थी...लेकिन अब जबकि सब ठीक होने की तरफ है, सोचती हूँ, तो पापा की मुस्कुराहट हौसला देती है और उनका वो सर्जरी के बाद चेतन होते ही किताब और चश्मा मांगना भी गुदगुदाता है।
*****

अलग-अलग लड़ाइयाँ

उसने "युद्ध-योजना" बनाई थी:

शत्रु: शिक्षा का पाखंड

 युद्ध-मैदान: यह कोचिंग

शस्त्र: ज्ञान

 सहयोगी: वह उत्कृष्ट कैडेट

 उसे लगा इसमें कमी है, पर क्या? वह सोचने लगा. उसे शगुन के मंत्र की याद आई.

*****

कविता: "बच्चे काम जा रहे है"

एक नई सुबह की शुरुवात कर सकेगा ।।

ज्ञान की नदियाँ बहा देगी बस एक उनको मौका तो दो ।

बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये ।।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 


1 टिप्पणी:

  1. पिता कहते थे—
    पुरुष अगर रोए
    तो समय को असहज कर देता है,
    सुंदर प्रस्तुति
    आभार
    वंदन

    जवाब देंहटाएं

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