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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

4643.. रैना कटे न दिन कटे

।।प्रातःवंदन।।

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के क्रम को बढाते हुए..✍️

आओ नव सृजन करें, 
बिखरा दें श्रम सीकर  
सुमनों से धरा भरें 
✨️


बजरबानी नहीं जानती, क्या होता है फेमिनिज्म !

उसका मर्द जब शराब में..
✨️

1. बदरी छाई जगत में, विपदा की चहुँ ओर । 

   रैना कटे न दिन कटे, कब होगी नव भोर ।।

2. माणिक माला कर गहे, नजर भरी मन मैल।
कलयुग का यह धर्म है, खड़े कुटिल बन शैल ।
✨️


क्या कहा—रोज़गार चाहिए?
तुम भूखे हो?
शर्म नहीं आती!
इस तरह तो तुम
देश को बदनाम करने की
साज़िश रच रहे हो।
 ✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद 
पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '✍️

1 टिप्पणी:

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