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गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

4658 घर की इज़्ज़त पे किसी गैर की हो आँख अगर

 सादर अभिवादन

आज पम्मी जी नहीं.हैं
चलिए चलें रचनाएं की ओर




घर की इज़्ज़त पे किसी गैर की हो आँख अगर,
ऐसा हो शख्स कोई घर से निकाला जाए ।

जब भी हो जाये किसी गैर पे विश्वास कभी,
उसकी पुश्तों को भी इक बार खंगाला जाए ।




दिल की लगी,
शून्य घरौंदें
तकते रहे
आसमां,
उड़
चुके प्रवासी पखेरु,धरातल
में बिखरे पड़े हैं कुछ
स्वप्न सप्तरंगी,




नीलकंठ महादेव बाघंबर धारी
हरो मन के विकार हे त्रिशूलधारी ।
तुमने विषपान कर हे त्रिपुरारी
जन की पीड़ा धारण की स्वयं ।
जीव मात्र को दिया पूर्ण संरक्षण





कितना था तंज उसके हर उठते सवाल में,
कुछ वो भी मुझसे तंग था कुछ मैं भी हाल में ।

चाहा जिसे वो शख्स था, मेरे ही ख्याल का,
वैसा नहीं था लुत्फ किसी के जमाल में ।

आज के अंक मे एक ब्लॉग की दो रचनाएं है
भाई हर्ष जी को शुभ कामनाएं

बस
सादर

1 टिप्पणी:

  1. व्वाहहहहह
    अपने मुंह मिया मिट्ठू...
    क्या प्रस्तुति बनी है आज
    वंदन

    जवाब देंहटाएं

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