शीर्षक पंक्ति: आदरणीया पूनम चौधरी जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
अब सुनो,
हम सागर की बात कर रहे थे
सागर में तैर रहा है एक जहाज़
जहाज़ पर हज़ारों लोग
लोगों में एक परिवार
जिनके मध्य बहता है प्यार
*****
पिता, माँ और रोने की
भाषा/ डॉ. पूनम चौधरी
पिता कहते थे—
पुरुष अगर रोए
तो समय को असहज कर देता है,
और समय
कभी भी असहज पुरुषों को माफ़ नहीं करता।
उन्होंने सिखाया,
सुख सार्वजनिक है दुख निजी
*****
अब पापा ठीक हो रहे हैं। घर आ गए हैं। बड़ी
मुसीबत आई थी...लेकिन अब जबकि सब ठीक होने की तरफ है, सोचती हूँ, तो पापा की मुस्कुराहट हौसला देती है और उनका वो सर्जरी के
बाद चेतन होते ही किताब और चश्मा मांगना भी गुदगुदाता है।
*****
उसने "युद्ध-योजना" बनाई थी:
शत्रु: शिक्षा का पाखंड
शस्त्र: ज्ञान
*****
एक नई सुबह की शुरुवात कर सकेगा ।।
ज्ञान की नदियाँ बहा देगी बस एक उनको मौका तो दो ।
बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये ।।
पिता कहते थे—
जवाब देंहटाएंपुरुष अगर रोए
तो समय को असहज कर देता है,
सुंदर प्रस्तुति
आभार
वंदन