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सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

1907 ...टपका दो विश्व के जलते छालों पर

सादर अभिवादन
इस नए फार्मेट का कोई ठिकाना नहीं
अपनी मनमर्जी से ब्लॉग के लिंक व चित्र
अपने मन से सेट करता है
एक लिंक आरोपित करने के बाद
प्रिव्यू देखना पड़ता है ये समझने के लिए
कि य़े फार्मेट चाहता क्या है
चलिए आज का अंक देखें...



राजमहल हैं लकदक झूले
तीज के मेले हम कब भूले
सावन, राखी मन ही भीगा
भीड़ बहुत पर रहे अकेले
कैसे जाल निराशा का फिर
अंतर्जाल ने तोड़ दिया..

बुद्धि बनी गांधारी ....अनिता सुधीर आख्या
शब्द लुभावन पासा फेंके 
मकड़जाल में मानव
मस्तिष्क शिरा फड़फड़ करती
इच्छा बनती दानव
बंदर जैसे मानव नाचे
साधन बने मदारी।। 

विश्व के छाले सहला दो ...कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


पर वो होता था मेरे लिए
तुम किसके लिए सहेज रहे

ये रजत किरणें दीप्त सी
बिखेर दो तम के साम्राज्य पर

साथ ही अमि सुधा की कुछ बूंदें
टपकादो विश्व के जलते छालों पर।।



माँ, भाभी, बहन को देखकर
कुंवारेपन से ही देखने लगती है
स्वप्न
जब वो भी करेगी व्रत
अपने पति के लिये
होते ही सुहागन
करने लगती है कामना
सुहाग के अमर होने की

लुटा रहा वह धार प्रीत की ...अनीता जी

लुटा रहा वह धार प्रीत की
दूजा  फल कटु-मृदु खोज रहा,
इक है निःशंक निज गरिमा में
कब दूजे को निज बोध रहा !

उड़ जाता है वह दूर दूर
संघर्षों का अनुयायी है,
नव नीड़ रचे ढूंढ प्रियजन 
अकुलाहट हिस्से आयी है !
......
हमें तो सही दिख रहा है
कोशिश किए हैं
सादर



8 टिप्‍पणियां:

  1. फार्मेट तो बिलकुल सही लग रहा है यशोदा जी, मनहर रचनाओं का चयन, आभार !

    जवाब देंहटाएं
  2. सुन्दर संयोजन, बधाई और मेरी रचना का चयन करने के लिए आभार

    जवाब देंहटाएं
  3. हमें तो सही दिख रहा है
    –सार्थक सफल कोशिश किए हैं
    अति सुन्दर प्रस्तुतीकरण
    सस्नेहाशीष अशेष शुभकामनाओं के संग छोटी बहना

    जवाब देंहटाएं

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