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शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

567..चुनाव और आदमी का प्रतिशत

सादर अभिवादन
नया रंग
नयी हवा
उमंग भी नयी
मोद है वसंत का
इसके आगे भी लिखा जा सकता था
पर बाकी आप पर छोड़ देता हूँ...
चलिए देखें आज क्या है
है तो जरूर .......

ठिठुरन का अन्त आ गया..........रचनाकार अज्ञात
मादक सुगन्ध से भरी 
पन्थ पन्थ आम्र मंजरी
कोयलिया कूक कूक कर
इतराती फिरै बावरी
जाती है जहाँ दृष्टि
मनहारी सकल स्रष्टि
लास्य दिग-दिगन्त छा गया
देखो बसन्त आ गया।



जिंदगी  से साँसों की,और 
साँसों की तुमसे हो जाती है..
मेरी साँसों में तुम्हारी खुश्बु बिखरी,
कि फिर वही माह-ए-फरवरी है...

कब हमने सोचा था कि ये पैर डगमगायेंगे,
बेटे हमारे लिये फिर लाठी ले के आयेंगे।

खाना बनाने से भी हम इतने थक जायेंगे
सीढी बिना रेलिंग की कैसे हम उतर पायेंगे।


उबलते जज्बात पर चुप्पी ख़ामोशी नहीं होती
गमों के जड़ता से सराबोर मदहोशी नहीं होती
तन के दुःख प्रारब्ध मान मकड़जाल में उलझा
खुन्नस में बयां चिंता-ए-हुनर सरगोशी नहीं होती


ये 
तन्हा 
सफर 
उदासियां 
मुश्किलें कई 
चुनौतियाँ नई 
कैसे कटे जीवन। 



वही रजाई वही कम्बल.....वन्दना गुप्ता
यहाँ तो वही रजाई वही कम्बल 
गरीबी के उलाहने 
भ्रष्टाचार के फरेब 
जाति धर्म का लोच 
वोट का मोच 
लुभावने वादों का गुलदस्ता 


आज का सच...

हर जाति 
का प्रतिशत
दिखाया 
गया है
आज के 
अखबार में
मीडिया 
भी खूब
भटकाती 
रही है
इस 
तरह के
समाचार में

आज बस यहीं तक
आज्ञा दें दिग्विजय को






6 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात..
    आभार
    रचना...
    ठिठुरन का अन्त आ गया के
    वास्तविक रचनाकार शास्त्री नित्य गोपाल जी कटारे जी हैं
    इसकी जाकारी पमें विनय रंजन ने दी
    मैं आभारी हूँ
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. ढ़ेरों आशीष संग आभार
    उम्दा प्रस्तुतीकरण

    जवाब देंहटाएं
  3. सुन्दर प्रस्तुति। आभार 'उलूक' का दिग्विजय जी एक पुराने सूत्र 'चुनाव और आदमी का प्रतिशत' को जगह देने के लिये।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर हलचल प्रस्तुति ..

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर संकलन। मेरी रचना को स्थान दिया, बहुत आभार।

    जवाब देंहटाएं

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