पाँच लिंकों का आनन्द

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शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

756...गेम खेलकर लोग क्यों कर रहे हैं सुसाइड

सादर अभिवादन...
बदल रहे हैं सबको...
हमारे तीन भाई बहन
हमें क्या किसी को भी...
आदत नहीं थी कि.... 

अपनी पसंदीदा रचनाओं 
पर अपने विचार रखना...
भाई कुलदीप जी की इसी सप्ताह की 
प्रस्तुति में देखने को मिली.....
शायद वे कोई नया साफ्टवेयर भी लाए हैं
पहले वे चित्र नहीं लगाते थे...

अब चित्र भी दिखाई पड़ने लगे हैं...
जो हो रहा है..अच्छा ही हो रहा है..
आगे और अच्छा होगा....पूर्ण विश्वास है


चलिए चलते हैं आज की पसंद की ओर.....
पहली बार भाई दिलबाग जी विर्क 

बातचीत बहाल कर...दिलबागसिंह विर्क 
मैं पश्चाताप करूँगा बीते दिनों के लिए
अपनी ग़लतियों का तू भी मलाल कर।

मैं कोशिश करूँगा ‘विर्क’ तेरा साथ देने की
तोड़ नफ़रत की दीवार, आ ये कमाल कर।

भाई खुशदीप जी सहगल भी पहली बार लाए गए हैं

द साइड इफैक्ट्स ऑफ ‘सुबह की सैर’…खुशदीप
जिस पार्क में मैं जाता हूं, वहां सुबह एक कोने में पांच छह बेंचों पर बुजुर्ग पुरुषों का जमावड़ा रहता है...रोज उनके वैसे ही हंसी ठहाके गूंजते रहते हैं जैसे कि स्कूल-कॉलेजों के छात्र साथ बैठने पर होता है...हमउम्र होने की वजह से इनमें ज़रूर कुछ नॉटी बातें भी होती होंगी...अच्छा इनका एक रूटीन और भी है...इनके लिए वहीं बेंच पर हर दिन केतली में चाय आती है...प्लास्टिक के कपों में इनका चाय पीना तो ठीक है लेकिन ये साथ में ब्रेड पकौड़े भी साफ करते दिखते हैं...अब ये इनकी सेहत के लिए कितना बेहतर है यही बता सकते हैं....



भाई की व्यथा.....विभा ठाकुर
बहना मेरी न पूछो तुम
बड़ा बुरा है हाल
भाभी तेरी बांध रही है
राखी अपने भाई को
कहि खलल ना पड़ जाए
मुझे बाहर है दिया निकाल 


शोर मचाती आँखें...पुरुषोत्तम सिन्हा
खामोशियों में कहकहे लगाती है तेरी ये दो आँखें!
कभी चुपचाप यूँ ही मचाती है शोर ये,
जलजला सा लेकर ये आती कभी हृदय में,
कभी मुक्त धार लिए बहती है चुपचाप ये दो आँखें....


"छोटू"......श्वेता सिन्हा
कंधे पर फटकर झूलती
मटमैली धूसर कमीज
चीकट हो चुके धब्बेदार
नीली हाफ पैंट पहने
जूठी प्यालियों को नन्ही
मुट्ठियों में कसकर पकड़े
इस मेज से उस मेज दौड़ता

विकल हृदय.....शशि पुरवार
घन घन घन, घनघोर घटाएँ 
गाएँ मेघ - राग मल्हार 
झूमे पादप, सर्द हवाएँ 
खुशियों का करें इजहार।



छिः ! ...रश्मि प्रभा
कभी अपने मायने तलाशती हूँ
कभी अपने बेमानीपन से जूझती हूँ
होती जाती हूँ क्रमशः निर्विकार
गुनगुनाती हूँ कोई पुराना गीत
खुद को देती हूँ विश्वास
कि ज़िंदा हूँ !


और अंत में एक गेम, विभिन्न समाचार पत्रों से...
जिसका नाम है ब्ल्यू व्हेल..

गेम खेलकर लोग क्यों कर रहे हैं सुसाइड?.... अमर उजाला
भारत में यह गेम हाल ही चर्चा में आया है, लेकिन रूस से लेकर अर्जेंटीना, ब्राजील, चिली, कोलंबिया, चीन, जॉर्जिया, इटली, केन्या, पराग्वे, पुर्तगाल, सऊदी अरब, स्पेन, अमेरिका, उरुग्वे जैसे देशों में कम उम्र के कई बच्चों ने इस चैलेंज की वजह से अपनी जान गंवाई है.
लोग हैरत में हैं है कि कोई ऑनलाइन गेम किसी के दिमाग पर इस तरह कब्ज़ा कैसे कर सकता है कि ख़ुदकुशी पर मजबूर कर दे.
हैरानी की बात यह है कि फिलिप ने रूसी प्रेस से कहा था कि उसके पीड़ित 'जैविक कूड़े' की तरह हैं और इस तरह वह 'समाज को साफ़' कर रहा है. उसे सेंट पीटर्सबर्ग की जेल में रखा गया है.

आज्ञा दें यशोदा को.....












10 टिप्‍पणियां:

  1. उम्दा प्रस्तुतीकरण छोटी बहना

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  2. शुभ प्रभात दीदी ,
    आपका स्वागत है। आते ही आपने इतने सुन्दर लिंक संजोए
    बेहतरीन संकलन ,
    बधाई !
    आपसभी के विचार अपेक्षित हैं ,
    आभार ,
    "एकलव्य"

    उत्तर देंहटाएं
  3. जी, दी आपने समसामयिक चर्चा पर दृष्टि डाली। बहुत ही बेहतरीन पठनीय लिंकों का चयन, मेरी रचना को मान देने के लिए आभार आपका दी।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढिया संकलन..
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. bahut sundar charcha hai . anand aa gaya . abhar hamen shamil karne hetu

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुतिकरण....
    उम्दा लिंक संकलन...

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेहतरीन लिंकों का संयोजन ।

    उत्तर देंहटाएं
  8. शुभ प्रभात !
    आदरणीय बहन जी अवकाश से लौटकर आपकी पहली प्रस्तुति विचारणीय रचनाओं का संकलन है। आभार सादर।

    उत्तर देंहटाएं

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