पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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गुरुवार, 24 अगस्त 2017

769.......ओस की बूँद जैसे नश्वर विश्वास पर


                                            सादर अभिवादन!
                    मंगलवार को सर्वोच्च न्यायलय ने मुस्लिम महिलाओं को क़ानूनी हक़ देते हुए तीन तलाक़ के रिबाज़ को प्रतिबंधित करने का ऐतिहासिक फ़ैसला दिया जिसका व्यापक स्वागत किया जा रहा है। संविधान की आत्मा के अनुसार समानता का अधिकार पाना सबका हक़ है।  पाकिस्तान सहित 8 मुस्लिम देश इस प्रथा को समाप्त कर चुके हैं तो भारत में ऐसा होना आश्चर्यजनक नहीं है। 
       
       चलिए आपको अब आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर  ले चलते हैं -
ग्लोबल रायटर होने के दायित्व से विमुख लोग तकनीक और सहूलियत का दुरूपयोग कर रहे हैं। यहाँ भी बयां हो रहा है  कुछ विचारणीय , गगन शर्मा जी की एक विचारणीय प्रस्तुति -

महिलाओं की "पोस्ट"पर न्यौछावर "कुछ" लोगों की अजीब मानसिकता.....गगन शर्मा, कुछ अलग सा


 वैसे कोशिशें जारी हैं इन पर भी तोहमत लगाने और नीचा दिखाने की !  अब तो जनता जनार्दन पर ही आशा है कि वह अपनी नींद त्यागे, अपने तथाकथित आकाओं की असलियत पहचाने, आँख मूँद कर उसकी बातों में ना आएं, नापे-तौलें फिर विश्वास करेंजाति-धर्म के साथ-साथ देश की भी सुध ले ! क्योंकि देश है तभी हमारा भी अस्तित्व है

     आदरणीय  दीदी साधना वैद जी की ताज़ा रचना जोकि  विश्वास की गहन व्याख्या करती है और उसके पहलुओं के अन्तर्सम्बन्ध उकेरती है।  पढ़िए- 

विश्वास......साधना वैद 


कैसा था यह विश्वास

 जो मन की सारी आस्था

सारी निष्ठा को

निमिष मात्र में हिला गया !  

किस विश्वास पर भरोसा करूँ

काँच से नाज़ुक विश्वास पर या

ओस की बूँद जैसे नश्वर

विश्वास पर

जैसा होना चाहिए जब वैसा हो तो व्यंग स्वतः अपना मार्ग तलाशता है। हमने ख़ूब सुना और पढ़ा है कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए नियुक्त अमला ख़ुद भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है।  कुछ ऐसा ही समाज का भ्रष्टाचार उजागर करती व्यंग के सिरमौर स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की आदरणीय दिग्विजय अग्रवाल जी द्वारा प्रस्तुत एक शानदार कृति-

अश्लील .............हरिशंकर परसाई

शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।

दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएँगे।


धरती को भले ही हमने राजनैतिक सीमाओं में बाढ़ लिया है लेकिन 

प्रकृति की अनमोल कृति कहलाता मनुष्य ही आज सर्वाधिक चर्चित है 

धरती की नैसर्गिकता को क्षति पहुँचाने के लिए।  पढ़िए एक सारगर्भित 

विचारोत्तेजक रचना सुधा देवरानी जी की -

धरती माँ की चेतावनी .......सुधा देवरानी 


अभी वक्त है संभल ले मानव !

खिलवाड़ कर तू पर्यावरण से

संतुलन बना प्रकृति का आगे,

बाहर निकल दर्प के आवरण से

चेतावनी समझ मौसम को कुदरत की !

वरना तेरी प्रगति ही तुझ पर भारी होगी

    अब तुझ पर ही तेरे विनाश की ,

        हर इक जिम्मेदारी होगी........

पम्मी जी की ताज़ातरीन रचना चुप होकर भी कितनी मुखर हो उठी है 

.....महसूस कीजिये एक मार्मिक अभिव्यक्ति में समाये एहसास

तुम चुप थी उस दिन.... पम्मी सिंह


जिंदगी की राहों से जो गुज़री हो 


जो ज़मीन तलाश कर सकी ,

मसाइलों की क्या बात करें..

ये उम्र के हर दौर से गुज़रती है.

  

 हिंदी के जाने माने साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित सुप्रसिद्ध कवि स्वर्गीय  डॉक्टर चंद्रकांत देवताले जी की अंजू शर्मा जी द्वारा प्रस्तुत पेश हैं  दस प्रतिनिधि रचनाऐं-


मैं वेश्याओं की इज्जत कर सकता हूं
 पर सम्मानितों की वेश्याओं जैसी हरकतें देख
 भड़क उठता हूं पिकासो के सांड की तरह
 मैं बीस बार विस्थापित हुआ हूं
 और ज़ख्मों की भाषा और उनके गूंगेपन को
 अच्छी तरह समझता हूं
 उन फीतों को मैं कूड़ेदान में फेंक चुका हूं
 जिनमें भद्र लोग
 जिंदगी और कविता की नापजोख करते हैं


           
             आपके सारगर्भित सुझावों की प्रतीक्षा में  
               अब आज्ञा दें। 
              फिर मिलेंगे।




बुधवार, 23 अगस्त 2017

768..कम से कम तवील राहों के सिम्त..

२ ३ अगस्त २ ० १ ७  

।। जयतु भास्कर ।।

उषा स्वस्ति..*

समाज के लिए कुछ बातें सहज ग्राह्य  नहीं होतें..
थोपे हुए रीति-रिवाज़ ही  विद्रोह का कारण
बनी, जो एक सामूहिक आवाज़ बन कर उभरी...

जुल्म कब तक सहूँ,
गर जिंदा हूँ 
तो हक के साथ जिंदा ऩज़र आना भी ज़रूरी है..

सुप्रीम कोर्ट का एक एतिहासिक फैसला
 मुस्लिम महिलाओं के  लिए नए युग की  शुरुआत...

चलों, कम से कम तवील राहों के सिम्त एक कदम तो, बढ़ी ...

तो..फिर बढतें है,

 आज़ की लिंक की ओर जिसे अनेक कोणों

 से ढूंढ  कर एक सूत्र में पिरोने की कोशिश

जो आप सभी के समक्ष इस प्रकार से है...

प्रकृति के अमर और नश्वर रूप का मनोरम वर्णन करती
 आदरणीया श्वेता जी की रचना...




प्रकृति करेगी नित नये श्रृंगार
सूरज जोगी बनेगा

ओढ़ बादल डोलेगा द्वार द्वार
झाँकेगी भोर आसमाँ की खिड़की

कल्पतरु ब्लॉग से अनुभव पर आधारित रचना....




टिफिन तैयार करके देती हैं, वे सुबह जल्दी उठकर

सारी सब्जियाँ काटकर, पकाकर, अच्छे से सजाकर

 ऑफिस के लिये टिफिन तैयार करके देती हैं।

 परंतु कई बार होता है कि हमें या तो टिफिन का 

खाना अच्छा नहीं लगता है, टिफिन पास में होते

 हुए भी बाहर का खाना खाने की इच्छा होती है या फिर

आदरणीय सुमित प्रताप सिंह जी की रचना..

भाई जिले!
हाँ बोल भाई नफे!
आज कैसे उदास हो बैठा है?
कुछ नहीं भाई बस इस जीवन से निराश हो गया हूँ।
वो क्यों भला?


प्रियंका गुप्ता द्वारा विचारपूर्ण लेख..



बरसों क्या, शायद सदियों पुरानी कहावत है ये...नेकी कर, दरिया में डाल...| आज तक 

बाकी दुनिया की तरह मेरे लिए भी इसका बस एक ही मतलब था...किसी का भला करो 

और उसे हमेशा के लिए भूल जाओ...| भूल जाओ ताकि न तो तुमको अपने किए

 परोपकार पर कोई अहंकार हो, और न ही तुम्हारे दिल में सामने वाले से उस अहसान

आदरणीया  ----कमला सिंह ' ज़ीनत' जी, की खूबसूरत गज़ल...

इक  मेरे  सहारे  को  बस  मेरा  खुदारा था 

गर्दिश ने जो घेरा तो कुछ काम  नहीं आया 
कहने  के लिए यूँ तो  कश्ती  का सहारा



#TripleTalaqसुबह तो मिली ...
          बड़ी लंबी रात थी..

अब मैं यहीं थमती हूँ.. कल की प्रस्तुति आदरणीय रवीन्द्र जी की है.


सम्यक् समीक्षा कर अभिव्यक्त करें,
| समाप्तम् |
धन्यवाद |
पम्मी



*वैदिक संस्कृति में प्रभात में 'उषा स्वस्ति ' और रात्रि में 'निशा स्वस्ति ' कहने की 
परंपरा है 




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