पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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रविवार, 22 अक्तूबर 2017

828....बस ढूंढता ही रहा, मैं मेरी तमन्नाओं का शहर!

सादर नमस्कार....
तेरस गया
गई चौदस भी
चली गई...
अमावस की रात भी
खा लिए भोग छप्पन..
हो गई दिल की बात
प्यारी बहनों से...
......
याद आ रही है...
महामना हरिवंश राय बच्चन की 
कुछ पंक्तियाँ
ना दिवाली होती, और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते

तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता........
…काश कोई मजहब ना होता....

चलिए चलते हैं आज-कल में पढ़ी रचनाओं की ओर..


दिया और हवाएं...ओंकार केडिया
इस बार की दिवाली कुछ अलग थी,
बस थोड़े से चिराग़ जल रहे थे,
अचानक तेज़ हवाएं चलीं,
एक-एक कर बुझ गए दिए सारे,
पर एक दिया जलता रहा,
लड़ता रहा तब तक,
जब तक थक-हारकर 
चुप नहीं बैठ गईं हवाएं.




बेखबर...पुरुषोत्तम सिन्हा
चल पड़े थे कदम उन हसरतों के डगर,
बस फासले थे जहाँ, न थी मंजिल की खबर,
गुम अंधेरों में कहीं, था वो चाहतों का सफर,
बस ढूंढता ही रहा, मैं मेरी तमन्नाओं का शहर!


नयन बसे.....श्वेता सिन्हा
नयन बसे घनश्याम,
मैं कैसे देखूँ जग संसार।
पलकें झुकाये सबसे छुपाये, 
बैठी घूँघटा डार।
मुख की लाली देखे न कोई,
छाये लाज अपार।


विश्व गुरु भारत.....राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"
मिले विश्व-गुरु का ताज़ भारत को,
करते हैं हम सब अर्चन,
पर, हम जानते हैं  कि हम ही हैं ,
इसकी राहों में अड़चन।


मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....नीतू ठाकुर
आज आँखों से बरसे जो आंसू तेरे,
दर्द दुनिया में सब को दिखाने लगे,
दर्द की इन्तेहाँ तुमने देखी कहाँ,
जो अभी से सभी को सुनाने लगे,


होता है दिल टुकड़े-टुकड़े.....हिया 'हया'
सहमा सहमा सारा मौसम
और नज़ारे उजड़े -उजड़े

मोर पपीहा गुमसुम-गुमसुम
कोयल के सुर उखड़े-उखड़े

आज बस...
आज्ञा दें दिग्विजय को
चलते-चलते..
आप लोगों ना कार व मोटर साइकिल पार्क तो किया ही होगा

पर गधे को पार्क करते नहीं देखा होगा
देखिए..मात्र 38 सेकेँड





शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

827.... भाईदूज




चित्र में ये शामिल हो सकता है: 6 लोग2013

भाई-बहन के प्यार का बंधन होता है बड़ा अनूठा
चाहे लाख मुसीबतें आएँ, ये रिश्ता कभी न टूटा
बहन माँ की तरह भाई पर ममता लुटाती है
भाई भी हर कष्ट सहकर अपनी बहन पर जान लुटाता है
कभी मीठी नोकझोंक होती है दोनों के बीच 
तो कभी दोनों एक-दूसरे की ताकत बन जाते हैं 
कभी छोटी-छोटी चीजों के लिए लड़ते थे जो 
एक-दूसरे के लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियाँ दे जाते हैं वो 
राखी और भाईदूज इस रिश्ते को फिर संवार जाते हैं
दिल की नजदीकियों के आगे दूरियों को मिटा जाते हैं
भाई-बहन दोनों बिन कहे एक-दूसरे की बात समझ जाते हैं
बहन के हाथों के बने पकवान, हमेशा भाई को लुभाते हैं
हर गुजरते दिन के साथ इस रिश्ते की अहमियत बढ़ती जाती है 
बचपन की खट्टी-मीठी यादें, इस रिश्ते में और मिठास घोल जाती है  
– अभिषेक मिश्र ( Abhi ) 


ढ़ेरों आशीष के संग असीम शुभकामनायें


भाई बहन के बिना क्या भाई दूज हो सकती है? 
बिल्कुल नहीं हो सकती. फिर इसका नाम सिर्फ भाई दूज क्यों? 
इसे बहन-भाई दूज भी तो कहा जा सकता है 
और कहना भी चाहिए.




एक वाटिका के पुष्प हैं
संग-संग झेले ऋतु आघात,
संग-संग पायी ममता प्रीति
साझे थे कितने प्रभात !




आज परदेस बैठी तेरी बहन तेरी राह देखा करती है
तुम्हारे बचपन के पल याद कर बस मुस्कुरा दिया करती हैं
फिर आँखों से लगा  ''टीका '' तुम्हें  भेज दिया करती हैं
जानती हूँ ही तुम हो अपनी दुनिया में मस्त
हम बहने भी अपनी छोटी से बगिया में व्यस्त
बंद लिफाफे में समेट कर प्यार भेज दिया करती है





मैंने तुमको, तुमने मुझको
क्या-क्या दिया, कौन बतलाये?
विधना भी चाहे तो स्नेहिल
भेंट नहीं वैसी दे पाये.
बाकी क्या लेना-देना? जब 
हम हैं एक-दूजे के साये.
भाई-बहिन का स्नेह गा सके
मिला न अब तक कोई गवैया




वो शाम ढले करना बातें मुझसे और अपनी हर बात मुझे बताना,
सुनके मेरी बेवकूफियां तुम्हारा ज़ोर से हंस जाना,
मेरी हर गलती पे लगाना डांट और फिर उस डांट के बाद मुझे प्यार से समझाना,
कोई और न होगा तुमसे प्यारा मुझे यह आज मैंने है जाना,

><><

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शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

826....जब मन में हो मौज बहारों की


दीपावली की शुभ कामनाएँ...
दीपावली की रात को कैसा दिखता होगा भारत
आपको अंदाजा नहीं होगा...
दीपों का त्यौहार दीपावली की रौशनी अब हमारे देश की सीमाओं को पार कर सात समंदर पार तक अपनी छटा बिखेर रही है, बल्कि ये कहें कि धरती ही नहीं धरती के आगे भी यानी अंतरिक्ष में भी अपनी छाप छोड़ रही है तो ये कहना गलत नहीं होगा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने एक तस्वीर जारी की है जिसमें भारत में दीपावली के पर्व पर अंतरिक्ष से भारत का किस तरह का नज़ारा दिखता है

आज गोवर्धन पूजा है....
और साथ-साथ अन्नकूट भी है
अर्पण छप्पन भोग प्रभु को,.......करिये पूजा मनमोहन की

छप्पन भोग का रहस्य
ऐसा माना  जाता है कि, माँ यशोदा बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट प्रहर भोजन कराती थी। जब इंद्र ब्रज वासियों पर कुपित हुए तो प्रलयकारी वृष्टि करने लगे। कृष्ण ने सभी गौ, ग्वालों और गोपिकाओं को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत उठा लिया। इंद्र हठ में आ गए और सात दिन तक लगातार वारिश करते रहे।  आठवें दिन इंद्र का घमंड चूर हुआ और इंद्र ने कृष्ण की शरण में आ कर क्षमा याचना की। वर्षा तो थम गयी लेकिन ग्वालों के साथ बाल कृष्ण सात दिन तक लगातार भूखे रह गए। व्रजवासियों और माँ यशोदा को कृष्ण का इतने लम्बे समय तक भूखा रहना बहुत कष्ट प्रद लगा। माँ यशोदा ने और सभी गोपिकाओं ने दिन में ८ प्रहर के हिसाब से ७ दिन के लिए ८ * ७=५६ प्रकार के भोजन बाल कृष्ण को सस्नेह अर्पित किये।



'आई दिवाली!'..... डॉ. राधिका गुलेरी
आई दिवाली! कुछ हैं बच्चे झोंपड़ी में रो रहे,
खुशियों-उमंगों से भरे सब स्वप्न उनके सो रहे,
आओ! कि जा के उन गुलों को फुलझड़ी पकड़ा दें हम,
चंद पल को ही सही ग़मों को उनके भुला दें हम।



दीप मेरे जल अकम्पित घुल अचंचल....महादेवी वर्मा
सिंधु का उच्छवास घन है 
तड़ित तम का विकल मन है 
भीति क्या नभ है व्यथा का 
आँसुओं में सिक्त अंचल 

स्वर अकम्पित कर दिशाएँ 
मोड़ सब भू की शिराएँ 
गा रहे आँधी प्रलय 
तेरे लिए ही आज मंगल 
.....
उपरोक्त दो रचनाएँ अनहद कृति से साभार...
आज की अंतिम रचना....
भारत रत्न आदरणीय अटल जी के कलम द्वारा प्रसवित...


आनंद की आभा होती है .....अटलबिहारी वाजपेयी
जब मन में हो मौज बहारों की
चमकाएँ चमक सितारों की,
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई  में  भी  मेले  हों,
आनंद की आभा होती है 
उस रोज़ 'दिवाली' होती है ।

आज्ञा दीजिए यशोदा को
कल आदरणीय विभा दीदी का पिटारा खुलेगा








गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

825...मिट जाये तम जीवन से....


सादर अभिवादन 
उजास के महापर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाऐं। 
धन तेरस ,नरक चतुर्दशी (छोटी दीवाली ), दीपावली , गोबर्धन पूजा और भैया दूज तक यह त्यौहार खुशियों से हमें भर देता है।विश्वकर्मा जी  और  चित्रगुप्त जी की  पूजा का भी विशेष महत्त्व है।  सामाजिक तानेबाने में दीवाली की अपनी ख़ास अहमियत है। 
 दिवाली के विविध रंग बिखेरती कुछ रचनाओं का आनंद लीजिये- 


 
मिट जाये तम जीवन से
लक्ष्मी माँ दे दो वरदान
हर लूँ निर्धनता हर घर से
हर होंठ खिले मुस्कान

भर भरकर मुट्ठी तारों से 
भरना उन बाड़ी बस्ती में
दिन का सूरज भी पहुँचे
निकले चाँद भी कश्ती में



 


मिट्टी पूजतीं हैं दीपावाली पर…..गिरीश बिल्लोरे


मिट्टी की लक्ष्मी मिट्टी के गणेश
रात भर दीप जगाने लायक तेल
माँ अम्मा दीदी बुआ
मिट्टी पूज के मनातीं हैं
दीवाली
वो दीवाली जो शायद
कोई कुबेर भी मना पाए
*संतुष्टि लक्ष्मी* की इन सखियों के साथ

आप सबको दीपावली की शुभकामनाएं

 

नन्हें - नन्हें माटी के
दीप हुए रोशन,
मानो प्रकाशदूत
धरती पर आए हैं

दीपकों की सेना है

शस्त्र है उजाले का,
इनके आगे अँधियारा
टिक नहीं पाए है


मन- मंदिर को रौशन बनाएंं🕯…सुधा देवरानी

 

निराशा हो मन में, हिम्मत हार जाएं,
चाहे कठिन हो राहेंं, कदम डगमगाएं
ईर्ष्या हो किसी से,लालच करें नहीं हम,
परिश्रम की राह चलकर सन्तुष्टि सभी पाएं
  आशा का एक दीप मन में जलाएं
       मन-मंदिर को रौशन बनाएं
चलो ! एक दिया आज मन में जलाएं  ।।

आज बस कहना है इतना ही...... 
दीपावली का आनन्द लेते समय
पर्यावरण की शुद्धता का ध्यान रखें
एवं पटाखे कम से कम जलाएँ....
फिर मिलेंगे। 
रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

824.....मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!


सादर अभिवादन,,,
माता काली को शत-शत नमन
आज काली चौदस है...
किसी अर्थ में इस दिन को
नरक चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है
इसके बारे में विस्तार से भाई रवीन्द्र जी बताएँगे
......
भाई कुलदीप जी से सुबह बात हुई इनसे...
उन्होंने एकदम नकार दिया
एक रचना - एक रचनाकार
के कार्यक्रम को...
दीपावली का समय है...
पाँच रचनाओं की ही बात है......
हम तीनों मिलकर रचनाएं चुन लेंगे....
.......
इस मंच में नवागन्तुक श्वेता जी का स्वागत है
आप जमशेदपुर से हैं...असाधारण घरेलू महिला
हार्दिक अभिनन्दन,,
........
सखी मीना जी का पसंदीदा साहित्यकार
ये रचना कक्षा दसवी के पाठ्यक्रम में है
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!........महादेवी वर्मा
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर!


अर्द्धांगिनी......सुशील शर्मा
पहले सिर्फ रिश्तों में थीं अब तो तुम्हारे अंग से मैं पूरा हुआ हूँ
"शैलेश ने वसुधा की गोदी में अपना सिर रखते हुए कहा।

बाहर बच्चों की किलकारियां और दीवाली के पटाखों की आवाज़ आ रही थीं
इधर वसुधा शैलेश के बालों में हाथ फिराते हुए  सोच रही थी क्या सावित्री अपने सत्यवान को इसी तरह से यमराज से लड़कर वापिस लाई होगी। उधर शैलेश सोच रहा है कि वाकई पुरुष अपनी
अर्द्धांगिनी के बिना कितना अधूरा रहता है।


जलाएंगे दीपक, करेंगे प्रकाश, तुम्हारे लिये.... कुलदीप ठाकुर
हम  जानते हैं
तुम्हे अपने  घर में
फैला हुआ अंधकार
अच्छा नहीं लगेगा...
हम  ये भी जानते हैं
तुम आओगे
किसी न किसी रूप में
हमारे साथ दिवाली मनाने....


दीवाली....श्वेता सिन्हा
लड़ियाँ नेह के धागों वाली,
झड़ियाँ हँसी ठहाकों वाली।

जगमग घर का कोना-कोना,
कलियाँ मन के तारों वाली।

रंग-रंगीली सजी रंगोली,
गुझिया मीठे पागों वाली।


किताबों की दुनिया.... नीरज गोस्वामी
दूर से इक परछाईं देखी अपने से मिलती-जुलती
पास से अपने चेहरे में भी और कोई चेहरा देखा

सोना लेने जब निकले तो हर-हर ढेर में मिटटी थी
जब मिटटी की खोज में निकले सोना ही सोना देखा


श्वेता सिन्हा के पसंदीदा ग़ज़लगो

दिलों के दरमियां...कुंवर बेचैन
फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक

यह तेरी काँवर नहीं कर्तव्य का अहसास है
अपने कंधे से श्रवण! संबंध का काँवर न फेंक

आज इतना ही..
इज़ाज़त दें
यशोदा ..

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

823... पिताजी के बिना पहली दिवाली है....


जय मां हाटेशवरी........


 इस बार दिवाली के आगमन पर मन हर्षित नहीं है....क्योंकि पिताजी के बिना पहली दिवाली है....
मुझे याद है जब बचपन में मैं चंडीगड़ में पढ़ा करता था। दिवाली में हमें दो तीन दिन का अवकाश ही होता था। बस द्वारा 10 से 12 घंटे का लंबा सफर करके पिता जी मुझे लेने अवश्य ही आते थे। वे कहते थे, "दिवाली सब के साथ ही अच्छी लगती है" फिर दिवाली के अगले दिन उन्हे मुझे छोड़ने वोही लंबा सफर झेलना पड़ता था। मुझे याद है, एक बार पिताजी काफी बीमार हो गये थे। मुझे दिवाली पर लेने नहीं आ सके। पर दिवाली से एक दिन पहले मुझे उनकी चिट्ठी व मनी-ऑर्डर मिल गया था। क्या रौनक होती थी उनके साथ दिवाली में।
तुम बिन पिताजी
अब हम कैसे मनाएंगे दिवाली
अपने हाथों से लाई मिठाई
खाने में वो आनंद नहीं आएगा....
पर इस दिवाली पर भी,
हम  जलाएंगे  दीपक
करेंगे  प्रकाश,
तुम्हारे लिये....
हम  जानते हैं
तुम्हे अपने  घर में
फैला हुआ अंधकार
अच्छा नहीं लगेगा...
हम  ये भी जानते हैं
तुम आओगे
किसी न किसी रूप में
हमारे साथ दिवाली मनाने....



ख़ाकी
अफ़सोस कि इस रंग पर ,
रिश्वत ,क्रूरता ,बर्बरता,अमानवीयता,ग़ैर-वाजिब हिंसा ,
विवेकाधिकार का दंभ ,भेदभाव का चश्मा, काला पैसा ,
सत्ता के आगे आत्मसमर्पण ,
पूँजी की चौखट पर तर्पण,
ग़रीब फ़रियादी को दुत्कार ,
आसमां से ऊँचा अहंकार ,
मूल्यों-सिद्धांतों को तिलांजलि !
 दे दी शपथ को  भी   श्रद्धांजलि !!

समझ
-आपके पहले मैं या मेरे पहले आप टिकट कटवाएँगे सासु जी..."
-संग-संग चलेंगे... समय के साथ खाद-पानी-हवा का असर होता है" दोनों की उन्मुक्त हँसी गूंज गई...

एक ख़त
जो तुमने मेरे जन्मदिन पर
बड़े जतन  से
खत के साथ भेजी थी .,
उनका सुर्ख रंग
कुछ  खो सा गया है
हमारे रिश्ते का रंग भी अब
उन पंखुड़ियों की तरह
कुछ और सा गया है

मुक्तक
कभी क्या सत्य छुपता है, अनर्गल झूठ बकने से।
करोगे दान तो थोड़ा, रुपैया खर्च हो जाता।
मगर लक्ष्मी नहीं जाती, अपितु आनन्द-धन आता।।

बात दिल की हमेशा सुना कीजिए
कब बदल जाए नीयत किसी की यहाँ
हर किसी से न  हँस के मिला कीजिए
मैंने अहसास दिल का बयाँ कर दिया
यूँ  न  हैरत से मुझको  तका कीजिए

कौन होगा अब निराला
एक अक्खड़ सादगी थे ।
विषमता के पारखी थे ।।
निगलते तो निगल लो -
कष्ट का सूखा निवाला ।।
कौन होगा अब निराला ?

यह रौशनी का त्यौहार है...
यह रौशनी का त्यौहार है...
दुल्हन सा सजा घर-बाज़ार है
जहां तलक भी नज़र है जाती
दिखता सुंदर प्रकाश ही प्रकाश है

और अंत में....
आज ही जुड़ी हैं श्रीमति श्वेता सिन्हा
हमसे, हमारी सहयोगी चर्चाकार के रूप में
उन्हें फिलहाल छठ पूजा तक कुछ नहीं करना है
सिर्फ हम पर नज़र रखनी है
धन्यवाद।

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

822...माननीय मालिक ने सोने के नाल जो ठुकवाए हैं।

भारत स्वतंत्र हो गया हर्ष का विषय ! लोकतंत्र प्रस्तुत है अपार सफलता का द्योत्तक ! स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार एक संकल्प ! परन्तु क्या न्याय सभी जन के लिए बराबर हुआ नहीं ना ,
तो फिर क्यों हम स्वतंत्रता का राग अलापते रहे सदियों से। हमारे वे वीर क्रांतिकारी किसके लिए सहर्ष फाँसी पर झूल गए ? 
क्या इस लिए कि एक निरंकुश शासक से सत्ता दूसरे अपने ही जैसा आचरण करने वाले जो अपने आप को भारतीय कहता है उसके हाथों में चली जाए ? हम पहले भी गुलाम थे आज भी हैं इसमें कोई संदेह नहीं !
क़ानून पहले अंग्रेज़ बनाते थे कुछ इस तरह कि उसकी दिशा उनके पक्ष में सकारात्मक किन्तु भारतीयों के नकारात्मक। 
क्या आज कुछ भी बदला है नहीं ना ! वैसे भी बदलना कौन चाहेगा मैं ,
जो एक आधी भरी स्याही से दुनिया बदलने चला हूँ अथवा 
वे जो बदलना ही नहीं चाहते। 
कोई कहता है बापू को इस लिए मार दिया गया क्योंकि वे किसी अतिविशिष्ठ पार्टी को भंग करना चाहते थे जो आज़ादी की लड़ाई लड़ते -लड़ते स्वयं आज़ादी का महत्व खो चुकी थी। कुछ का कहना है किसी सिरफिरे ने बापू की हत्या कर दी। मेरा प्रश्न है इतिहास को याद करना और उससे शिक्षा लेते हुए भूत में किए गए गलत कार्यों की पुनरावृति न करना यहाँ तक तो ठीक किन्तु उस इतिहास को बार -बार लोगों को स्मरण कराना केवल अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए कहाँ तक ज़ायज़ है !
आज हम पंगु हो गए हैं।  
हमारी सोच कहाँ जाये ?
क्या करे ?
किस पार्टी पर विश्वास करे ?
और करे भी तो क्यूँ ?
कौन सरकार ईमानदार है ?
कौन बेईमान ?
सोच -सोच कर नसें फटी जा रहीं हैं। 
क्यों सही कहा ना क्योंकि हम कुछ नहीं कर सकते !
मुझे मरने से बहुत डर लगता है ,मैं जीना चाहता हूँ 
उन भेड़ों की तरह 
रेंगना चाहता हूँ !
उन कीड़ों की तरह 
दौड़ना चाहता हूँ !
घोड़ों की तरह 
परन्तु 
दूसरों के इशारों पर 
और दौड़ भी रहा हूँ, बड़े शान से। और क्यों न दौड़ू ?
मेरे पैरों में मेरे माननीय मालिक ने सोने के नाल जो ठुकवाए हैं। 
बड़े ही दयालु हैं मेरे मालिक जिन्होंने मेरी ही सम्पति पर देखभाल का हवाला देकर कब्ज़ा जमा रखा है। आज मैं निश्चिंत होकर खुले आसमान में दौड़ रहा हूँ और उनके दिए हुए रोटी को खाकर गुजारा कर रहा हूँ। अलग बात है वो रोटी मेरे ही घर के आटे की बनी थी। चलो अच्छा हुआ खाना बनाने के उस ताम -झाम से छुटकारा मिला। 
ठीक है बस करो अब जाने दो !
कल सुबह जल्दी उठना है 
मालिक को लेकर दौड़ना भी तो है। और वैसे भी वर्ष में लगभग 
तीन से छः बार नौकरी है उनकी। 
ओ हो कितना काम करते हैं मालिक ! 
हमारे लिए कानून बनाना आसान तो नहीं  और वो भी वातानुकूलित कक्ष में आराम कुर्सी पर बैठ कर। 
मैं तो नहीं कर सकता !
मुझे तो जानवर की तरह दौड़ना अच्छा लगता है। 
चलो भाई दौड़ते रहो ! 

( प्रस्तुत विचार मेरे स्वयं के मौलिक विचार हैं। कृपया कोई भी व्यक्ति इसे हथियाने का प्रयास न करे ! )

नोट : ये शर्त बालकनी में बैठे माननीय लोगों पर लागू नहीं होतीं !


आपका अभिवादन। 

 मज़लूमों की इंसाफ़ की गुहार ,
हों ग़िरफ़्त में मुज़रिम-गुनाहगार ,
हादसों में हाज़िर सरकार , 
ख़ाकी को दिया ,
सम्मान और प्यार ,

 संवेदनशीलता....व्हाट्स एप्प से 'लघु' कथा 
आदरणीय ''दिग्विजय अग्रवाल'' द्वारा संकलित 


एक दिन उन्हें एक चिट्ठी मिली, पता माधोपुर के करीब का ही था लेकिन आज से पहले उन्होंने उस पते पर कोई चिट्ठी नहीं पहुंचाई थी।
रोज की तरह आज भी उन्होंने अपना थैला उठाया और चिट्ठियां बांटने निकला पड़े। सारी चिट्ठियां बांटने के बाद वे उस नए पते की ओर बढ़ने लगे।......दरवाजे पर पहुँच कर उन्होंने आवाज़ दी, “पोस्टमैन!”

 ओ! शरद पूर्णिमा के शशि नवल !! -कविता --
आदरणीया ''रेणु बाला'' जी की एक सुन्दर कृति  


तुम्हारी  आभा  का  क्या  कहना !
ओ! शरद पूर्णिमा के शशि नवल !!
कौतुहल हो तुम  सदियों से 
श्वेत , शीतल , नूतन धवल !!! 

 हम-तुम.... 
आदरणीय  राकेश कुमार श्रीवास्तव ''राही''



 चलो फिर से वही अपने, 
सुहाने दिनों को लें आयें। 

चलो फिर से वही अपने, 
ख़ुशी के पलों को लें आयें। 

शरद हंसिनी...आदरणीय ''पुरुषोत्तम सिन्हा'' 



नील नभ पर वियावान में,
है भटक रही.....

क्यूँ एकाकिनी सी वो शरद हंसिनी?

 शरद का चांद....आदरणीय "ज्योति खरे"


फक्क सुफेद चांद
जब भी उछलकर 
तुम्हारी गोद में गया 
तुमने झिड़क दिया

  मेरे स्नेही सागर !....आदरणीया ''मीना शर्मा" 


 किंतु मैं तो दौड़ी आती हूँ
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए !
मुझे तुम्हारे मुक्ता मणियों की
ना आस है ना चाव !

  **खूँटी पर बँधी है रस्सी**...
आदरणीया ''ऋतु आसूजा'' 


  जीवन की डोर पहुँच रही है,ना जाने
किस-किस की धर्मराज के ,ओर
मौत की खूँटी पर लटकी है,गर्दन
पैर लटक रहे हैं कब्र पर

उस पर असीमित जिज्ञासाओं का मेला

 शाश्वत कटु सत्य ... !!!
आदरणीया '' रश्मि प्रभा''...

 जब मेरे मुँह से ओह निकलता है
या रह जाती है कोई स्तब्ध
निःशब्द आकुलहट
उसी क्षण मैं मन की कन्दराओं में
दौड़ने लगती हूँ
कहाँ कहाँ कौन सी नस
दुख से अवरुद्ध हो गई"

 मिट्टी के घरोंदे है, लहरों को भी आना है......
मनोज सिंह”मन”
आदरणीया ''यशोदा अग्रवाल" द्वारा संकलित  


 टूटी हुई कश्ती है, दरिया पे ठिकाना है,
उम्मीदों का सहारा है,इक दिन चले जाना है,

 गीत "पथ का निर्माता हूँ" 
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ऐसे सम्मेलन में, खुद्दारों का होगा मान नहीं,
नहीं टिकेगी वहाँ सरलता, ठहरेंगे विद्वान नही,
नोक लेखनी की अपनी में, भाला सदा बनाऊँगा।

 आज्ञा दें। 

"एकलव्य" 
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