।।नमस्कार सर्वेषाम्।।
आज तम्हीद की जरूरत नहीं..
कुछ नए लफ्ज़ कुछ पुराने शब्दों के कांरवा से
जज्बातों और बातों से जीवन में नए संवेदनाओं को उभरने दो..
इसी के साथ रूख करें आज की लिंकों पर..✍
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दूध सा उफान खाती
ताकत के गुरूर में उन्मुक्त
लहर ……,
नाहक गर्जन तर्जन करती हैं
शुक्ल पक्ष का दौर है
और समय भी परिवर्तन शील
दुःख के स्वाङ्ग
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बस्तर की अभिव्यक्ति -जैसे कोई झरना.... से,
हरियाणा की बेटी अकेली
हिमांचल की वादियों में
बेटे की सलामती के लिए दिया जलाती बूढ़ी माँ
और झुर्रियों भरे चेहरे पर मुरझायी आँखों से
प्रतीक्षा करते बूढ़े पिता... मुझे पता है
दुःख का यह पहाड़
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वंदे मातरम् से विचारणीय प्रस्तुति..
जीवंत किरदारों से प्रेरणा लेना हर लेखक का सामान्य व्यवहार है लेकिन जब लेखक किसी जीवंत किरदार का पीछा करने लगता है तो वह अनभिज्ञता में ही सही, अपने लेखकीय धर्म को तिलांजलि दे रहा होता है। किरदारों का पीछा पत्रकार करते हैं, साहित्यकार नहीं। साहित्य पत्रकारिता नहीं है..
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अनुपम चौबे जी की रचना..
जब यारों की महफ़िल में अचानक
छिड़े चर्चा मोहब्बत बाली,
या फिर नुक्कड़ बस्ती दूर गली में
कोई दिखती है भोली भाली,
करूँ जतन पर,दिल पर मेरे
छुरियाँ सी चल जाती हैं
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आज से नवदुर्गा हमारे घरों में विराजेंगी, पूरे नौ दिन देश में ऋतुओं के माध्यम से जीवन में उतरते नवसंचार को उत्सवरूप मनाने के दिन हैं। एक समाज के तौर पर इन नौ दिनों में हम अपने संस्कारों के किस किस स्तर को समृद्ध करें और सोच के किस स्तर को परिष्कृत करें, यह भी सोचना आवश्यक हो गया है। यह कैसे संभव है कि एक ओर हमें 'दुर्गा' कहा जाए और दूसरी ओर ..
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तुम पढ़ लेना खुद को उसमें ।
बिखरते लफ़्ज़ों को समेट
रच दूँ जब नज़्म कोई
तुम ढूँढ़ लेना
अनकहा पैगाम कोई।
कभी मुस्कुराते लब
और नम आँखें लिए
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह..✍




