होली का तीसरा दिन
ऐसा तो कहीं नही लगता कि
होली आई थी...
होली आई थी...
लिखना-पढ़ना बदस्तूर जारी है
चलिए शार्टकट लेते हैं.....
चलिए शार्टकट लेते हैं.....

उड़े होली के रंग बहुत
तूम मेरा रंग लगाओ न
चढ़े होली के भंग बहुत
होठो से भंग पिलाओ न।

रंग....पुरुषोत्तम सिन्हा
कहीं सूखते पात,
बिछड़ते डाली से छूटते हाथ,
कहीं टूटी डाल,
कहीं नव-कलियों का ताल,
कहीं खिलते हँसते फूल,
वहीं मुरझाए से फूल,
जमीं पर औंधे छाए से फूल,
वहीं झूलती डाली पर विहँसते शूल,

लिखा जाना बाकी है अभी!..अपर्णा वाजपेई
जानता हूँ जब भी लिखेगी मुझको वो
शर्म से खुद में ही बार-बार सिमट जायेगी
हर एक हर्फ़ के बाद खुद से पूछेगी
कोरे कागज़ को एहसास बताना गुस्ताख़ी तो नहीं?
दर्द का हर डंक...अभिलाषा (अभि)
दर्द का पर्यायवाची बन गया ये जीवन
और हर पर्याय पर
भिनभिना रही हैं मधुमक्खियां
कि हर आहट पर
डंक मारने को आतुर,
बेतरतीब सी दौड़ती जा रही हैं
हज़ारों गाड़ियां सड़क पर
गावै कोयलिया कुहू कुहू ...पुष्पेन्द्र द्विवेदी
अमिया अमराई पीहू पीहू गावै कोयलिया कुहू कुहू ,
तन गीला कैसे धीज धरूँ मैं बिरहन तपती जलती मरू ।
पी पी भांग धतूरा अब तो चम्म हो गए सारे ,
मटका में मट्ठा घुलवाओ कोई निमकी चटवाओ अब तो ।

कश्मकश!......अनीता लागुरी (अनु)
मेरे हाथों में कांपते मेरे सपने भी हैं ...!
कुछ कहने को उतावला मेरा मन भी है
हाँ वो गोले आग के,मेरे अंदर भी हैं ।
उलूक की खबर

रंग को रंग
ही रहने दे
अगर मिलायेगा
समझ ले बाद में
तेरे ही सर
चढ़ के बोलेगा
होली का होला
कब हो गया
“उलूक” तू बस
ऊपर से नीचे
देखता रह जायेगा ।
...........
आज बस
दिग्विजय

रंग....पुरुषोत्तम सिन्हा
कहीं सूखते पात,
बिछड़ते डाली से छूटते हाथ,
कहीं टूटी डाल,
कहीं नव-कलियों का ताल,
कहीं खिलते हँसते फूल,
वहीं मुरझाए से फूल,
जमीं पर औंधे छाए से फूल,
वहीं झूलती डाली पर विहँसते शूल,

लिखा जाना बाकी है अभी!..अपर्णा वाजपेई
जानता हूँ जब भी लिखेगी मुझको वो
शर्म से खुद में ही बार-बार सिमट जायेगी
हर एक हर्फ़ के बाद खुद से पूछेगी
कोरे कागज़ को एहसास बताना गुस्ताख़ी तो नहीं?
दर्द का हर डंक...अभिलाषा (अभि)
दर्द का पर्यायवाची बन गया ये जीवन
और हर पर्याय पर
भिनभिना रही हैं मधुमक्खियां
कि हर आहट पर
डंक मारने को आतुर,
बेतरतीब सी दौड़ती जा रही हैं
हज़ारों गाड़ियां सड़क पर
गावै कोयलिया कुहू कुहू ...पुष्पेन्द्र द्विवेदी
अमिया अमराई पीहू पीहू गावै कोयलिया कुहू कुहू ,
तन गीला कैसे धीज धरूँ मैं बिरहन तपती जलती मरू ।
पी पी भांग धतूरा अब तो चम्म हो गए सारे ,
मटका में मट्ठा घुलवाओ कोई निमकी चटवाओ अब तो ।

कश्मकश!......अनीता लागुरी (अनु)
मेरे हाथों में कांपते मेरे सपने भी हैं ...!
कुछ कहने को उतावला मेरा मन भी है
हाँ वो गोले आग के,मेरे अंदर भी हैं ।
उलूक की खबर

रंग को रंग
ही रहने दे
अगर मिलायेगा
समझ ले बाद में
तेरे ही सर
चढ़ के बोलेगा
होली का होला
कब हो गया
“उलूक” तू बस
ऊपर से नीचे
देखता रह जायेगा ।
...........
आज बस
दिग्विजय

