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सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
गलतफहमी कि संतुष्टि थी
जबकि
कुछ पूरी करनी अभी बाकी है
ठंडी बहती हवाओ में
दूर तक फैले झील में
दुधिया चांदनी रात में
नाव कि सैर अभी बाकी है

बड़े अरमान से सजाया था
वो जो टुटा सपना
अब किसके पास जाऊँगा
लेकर अरमां अपना-

हसरतें
रेशमी कपड़ो में
सज धज कर निकलती है
लोगों की आँखे चुधियाँ जाती है
भगवान तू भी तो
फरियाद उनकी ही सुनता है

हसरतें
निगाहें चौंक उठती है अक्सर
अपना ही अक्स देखकर
कुछ अंजान सा दिखता अब
ख़ुद का ही वजूद ख़ुदको
जिससे पहचान थी कभी
वो कहीं खो सा गया
हसरतें

मन की बात
बहुत जतन से
संभाल रही हूँ हालात को...
मुट्ठी भर रेत-सी
रह गई है साँसे हाथ में
और आँखों से गिरते अविरल आंसू
भीगो रहे है सासों की मिट्टी को।
कि....नहीं कर पाऊँगी कभी
खुद से अलग उसे
मिलते रहेंगे...