सादर अभिवादन।
आधुनिक तकनीक की उपयोगिता और संचार माध्यम के क्रांति के इस दौर में इलेक्ट्रॉनिक बुक (ई-बुक) के प्रति लोगों का रूझान बढ़ा है, परंतु छपाई के पुस्तकों की प्रासंगिकता भी कम नहीं हुई है। ई-बुक की पहुँच आभिजात्य वर्ग तक ही सीमित है जबकि पुस्तक आम जनमानस के सभी वर्ग की पहुँच में है।
डर इस बात का है कि ई-बुक के बढ़ते प्रचलन से कहीं पुस्तकों की परंपरा और उत्कृष्ट साहित्य की संस्कृति खत्म न हो जाए। इलेक्ट्रॉनिक किताबें छपी हुई किताबों को नजरअंदाज कर देंगी क्या?
डर इस बात का है कि ई-बुक के बढ़ते प्रचलन से कहीं पुस्तकों की परंपरा और उत्कृष्ट साहित्य की संस्कृति खत्म न हो जाए। इलेक्ट्रॉनिक किताबें छपी हुई किताबों को नजरअंदाज कर देंगी क्या?
चिंता की बात है कि देश के बड़े हिस्से में बच्चों के लिए किताब का अर्थ पाठ्यपुस्तक से अधिक नहीं है।
कुछ सवालों का जवाब आप पर छोड़कर चलिए पढ़ते है
आज की रचनाएँ......
कल मशहूर श़ाय़र अकबर इलाहाबादी का जन्म दिन था
उनकी दो रचनाएँ पढ़िए...
उनकी दो रचनाएँ पढ़िए...
बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियाँ
कोई हँस रहा है कोई रो रहा है
कोई पा रहा है कोई खो रहा है
कोई ताक में है किसी को है गफ़लत
कोई जागता है कोई सो रहा है
अंतर्मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती
आदरणीया यशोदा दी की
सुंदर रचना
देखो पलट कर
वो साया है
तुम्हारा ही..
तलाशो उसे
अपने भीतर
भूलकर अंधेरे को
जला लो फिर से
एक बाती
वो साया है
तुम्हारा ही..
तलाशो उसे
अपने भीतर
भूलकर अंधेरे को
जला लो फिर से
एक बाती
१९ नवंबर को रानी लक्ष्मी बाई की १८२वीं जयंती है। पढ़िये
आदरणीय अमित जी की
प्रखर लेखनी से एक ओजमयी रचना
विस्मृति की धुंध हटाकर के, स्मृति के दीप जला लेना
झांसी की रानी को अपने, अश्कों के अर्घ चढ़ा देना।
आज़ादी की बलिबेदी पर, हँसतें हँसते कुर्बान हुई
उस शूर वीर मर्दानी को, श्रद्धा से शीश झुका देना।
झांसी की रानी को अपने, अश्कों के अर्घ चढ़ा देना।
आज़ादी की बलिबेदी पर, हँसतें हँसते कुर्बान हुई
उस शूर वीर मर्दानी को, श्रद्धा से शीश झुका देना।
बेटी के आगमन पर पीहर का हाल बयान करती
आदरणीया नीतू जी की
हृदयस्पर्शी भावपूर्ण कविता
मायके में बिटिया रानी
पलकों को आँचल से पोछा,
चेहरे पर मुस्कान सजाई,
जब देखी आंगन में मैंने,
अपने बाबुल की परछाई,
बार बार घड़ी को देखे,
जैसे समय को नाप रहे थे,
नये साल की सुगबुगाहट शुरु हो गयी है
बदलते वक्त को खूबसूरत शब्दों में पिरोती
आदरणीय पुरुषोत्तम जी की
भावपूर्ण रचना
नव ऊर्जा बाहुओं में भरकर,
कीर्तिमान नए रचने को कहकर,
लक्ष्य महान राहों में रखकर,
आँखों में नए सपने देकर,
विकास पुरोधा बनकर, बदल रहा ये साल...
कीर्तिमान नए रचने को कहकर,
लक्ष्य महान राहों में रखकर,
आँखों में नए सपने देकर,
विकास पुरोधा बनकर, बदल रहा ये साल...
जीवन का सच बयान करती
आदरणीया अनुपमा जी की
दार्शनिक भाव लिए बहुत सुंदर रचना

विराट दुख के साँचों में
ढल कर भी
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी ही रहेगी
और अंत में अद्भुत शब्दों के मनमोहक डंक में उलझाते
आदरणीय विश्वमोहन जी की
डेंगू के कहर से त्रस्त मार्मिक अभिव्यक्ति
ज़िन्दगी ही रहेगी
आदरणीय विश्वमोहन जी की
डेंगू के कहर से त्रस्त मार्मिक अभिव्यक्ति
प्लेटलेट्स की पतवार फंसी 'डेंगी' में।
तुमसे श्वेत तो वो ' एडिस'
काल-दंश-धारी!
चाहे हो राजा या रंक
बिना भेद के मारता डंक।
आज के लिए बस इतना ही
आपके बहुमूल्य सुझावों की
प्रतीक्षा में
तुमसे श्वेत तो वो ' एडिस'
काल-दंश-धारी!
चाहे हो राजा या रंक
बिना भेद के मारता डंक।
काल-दंश-धारी!
चाहे हो राजा या रंक
बिना भेद के मारता डंक।
आज के लिए बस इतना ही
आपके बहुमूल्य सुझावों की
प्रतीक्षा में




