सादर अभिवादन।
जैसे-जैसे मौसम में बदलाव होता जा रहा है हमें धूप उतनी ही प्रिय लगने लगती है। डॉक्टर शीत ऋतु को हेल्दी सीजन कहते हैं। बच्चों और वृद्ध जनों को यह ऋतु अधिक प्रभावित करती है। साँस सम्बन्धी तकलीफ़ें बढ़ जाती हैं हवा में नमी के कारण वहीँ वृद्ध जनों को हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ जाता है। अतः सावधानी बरतना उत्तम उपाय है। मुझे ग्वालियर के वरिष्ठ साहित्यकार गीतकार और मेरे मार्गदर्शक आदरणीय जानकी प्रसाद "विवश" जी की दो पंक्तियाँ याद हो आयीं हैं -
"सर्दियों में धूप हमको इस तरह प्यारी लगी ,
आपकी छवि व्यथित मन को बेहद सुखकारी लगी।"
चलिए अब आपको अपनी पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलते हैं -
जैसे-जैसे मौसम में बदलाव होता जा रहा है हमें धूप उतनी ही प्रिय लगने लगती है। डॉक्टर शीत ऋतु को हेल्दी सीजन कहते हैं। बच्चों और वृद्ध जनों को यह ऋतु अधिक प्रभावित करती है। साँस सम्बन्धी तकलीफ़ें बढ़ जाती हैं हवा में नमी के कारण वहीँ वृद्ध जनों को हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ जाता है। अतः सावधानी बरतना उत्तम उपाय है। मुझे ग्वालियर के वरिष्ठ साहित्यकार गीतकार और मेरे मार्गदर्शक आदरणीय जानकी प्रसाद "विवश" जी की दो पंक्तियाँ याद हो आयीं हैं -
"सर्दियों में धूप हमको इस तरह प्यारी लगी ,
आपकी छवि व्यथित मन को बेहद सुखकारी लगी।"
चलिए अब आपको अपनी पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलते हैं -
पेश है आदरणीया ऋता शेखर 'मधु' जी की एक ख़ूबसूरत रचना-
कटते रहे शजर और बनते रहे मकाँ
हर ही तरफ धुआँ है कहाँ आदमी रह
आकाश में बची हुई बूँदें धनक बनीं
हमदर्द जो हों लफ़्ज़ तो यह ज़िन्दगी रहे
यथा नाम तथा गुण को चरितार्थ करतीं
आदरणीया रश्मि प्रभा जी हाज़िर हैं
अपनी एक गंभीर उत्कृष्ट कोटि की रचना के साथ -

मैं तुमसे कभी नहीं मिलना चाहूँगी
फिर भी,
गर मिल गए
तो मेरी खामोश नफरत को कुरेदना मत
क्योंकि उससे जो आग धधकती है
उस चिता में
तुम्हारे संग
कुछ आत्मीय चेहरे भी
झुलसने लगते हैं
उन चेहरों को निकालते हुए
मेरा हृदय छालों से भर जाता है
फिर ...
हिंदी साहित्य की दो महान विभूतियों आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉक्टर रामविलास शर्मा ने हिंदी गद्य के विकास में जो अतुलनीय योगदान समर्पित किया है उस पर एक शोधपरक आलेख के साथ आदरणीय
अश्विनी कुमार लाल-
अश्विनी कुमार लाल-

डॉ. रामविलास शर्मा हिंदी-उर्दू को एक ही भाषा की दो शैलियां मानते थे। इनके तमाम साहित्य को एक ही जाति का साहित्य कहा है। अंग्रेजों ने हिंदी-उर्दू के बीच विभाजक रेखा खींच कर, उनका संबंध मजहब से जोड़ दिया है जो हमारे जातीय एकता में बाधक सिद्ध हुई है। डॉ. रामविलास शर्मा इस संदर्भ में लिखते हैं- “हिंदी-उर्दू विवाद को इतना जहरीला बना दिया गया है कि बहुत से लोग भूल गए हैं कि वे एक ही बोलचाल की भाषा के दो रूप हैं, इनका तमाम साहित्य भला-बुरा जो कुछ है, एक ही जाति का साहित्य है। जैसे-जैसे लोग यह समझेंगे कि हिंदी-उर्दू वाले एक ही प्रदेश के रहने वाले हैं, एक ही कौम हैं, उनकी बोलचाल की भाषा एक है और इसलिए उनके साहित्य की भाषा को भी एक होना पड़ेगा, वैसे-वैसे यह अलगाव कम होगा।”15 इस प्रकार डॉ. रामविलास शर्मा ने हिंदी-उर्दू को एक ही भाषा की दो शैलियों के रूप में देखा, जो ठीक भी है।
आपको आश्चर्यचकित कर देने वाली चित्रावली
ब्लॉग "नई विधा" पर पेश कर रही हैं
आदरणीया दिव्या अग्रवाल जी -
आपको आश्चर्यचकित कर देने वाली चित्रावली
ब्लॉग "नई विधा" पर पेश कर रही हैं
आदरणीया दिव्या अग्रवाल जी -

और अंत में पेश है आदरणीया दीदी विभा रानी श्रीवास्तव जी की एक
प्रभावशाली अर्थपूर्ण लघुकथा -
"मसक गया"….. विभा रानी श्रीवास्तव

तभी एक का फोन घनघनाया
हैलो!"
"इतनी रात तक कहाँ
बौउआ रही हो?"
"बैठ गए हैं ऑटो में बस पहुंचने वाले ही हैं"
"बहुत पंख निकल गया है ... बहुत हो
गई मटरगश्ती...
कल से बाहर निकलना एकदम बन्द तुम्हारा..."
पूछ! नहीं लौटूँ जेल, चली जाऊँ दीदी के घर..."
आज बस इतना ही।
आपके उपयोगी फीड बैक की प्रतीक्षा में।
फिर मिलेंगे।
