
सादर अभिवादन,,,
माता काली को शत-शत नमन
आज काली चौदस है...
किसी अर्थ में इस दिन को
नरक चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है
इसके बारे में विस्तार से भाई रवीन्द्र जी बताएँगे
......
भाई कुलदीप जी से सुबह बात हुई इनसे...
उन्होंने एकदम नकार दिया
एक रचना - एक रचनाकार
के कार्यक्रम को...
दीपावली का समय है...
भाई कुलदीप जी से सुबह बात हुई इनसे...
उन्होंने एकदम नकार दिया
एक रचना - एक रचनाकार
के कार्यक्रम को...
दीपावली का समय है...
पाँच रचनाओं की ही बात है......
हम तीनों मिलकर रचनाएं चुन लेंगे....
हम तीनों मिलकर रचनाएं चुन लेंगे....
.......
इस मंच में नवागन्तुक श्वेता जी का स्वागत है
आप जमशेदपुर से हैं...असाधारण घरेलू महिला
हार्दिक अभिनन्दन,,
........
सखी मीना जी का पसंदीदा साहित्यकार
ये रचना कक्षा दसवी के पाठ्यक्रम में है
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!........महादेवी वर्मा
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर!

अर्द्धांगिनी......सुशील शर्मा
पहले सिर्फ रिश्तों में थीं अब तो तुम्हारे अंग से मैं पूरा हुआ हूँ
"शैलेश ने वसुधा की गोदी में अपना सिर रखते हुए कहा।
बाहर बच्चों की किलकारियां और दीवाली के पटाखों की आवाज़ आ रही थीं
इधर वसुधा शैलेश के बालों में हाथ फिराते हुए सोच रही थी क्या सावित्री अपने सत्यवान को इसी तरह से यमराज से लड़कर वापिस लाई होगी। उधर शैलेश सोच रहा है कि वाकई पुरुष अपनी
अर्द्धांगिनी के बिना कितना अधूरा रहता है।
जलाएंगे दीपक, करेंगे प्रकाश, तुम्हारे लिये.... कुलदीप ठाकुर
हम जानते हैं
तुम्हे अपने घर में
फैला हुआ अंधकार
अच्छा नहीं लगेगा...
हम ये भी जानते हैं
तुम आओगे
किसी न किसी रूप में
हमारे साथ दिवाली मनाने....

दीवाली....श्वेता सिन्हा
लड़ियाँ नेह के धागों वाली,
झड़ियाँ हँसी ठहाकों वाली।
जगमग घर का कोना-कोना,
कलियाँ मन के तारों वाली।
रंग-रंगीली सजी रंगोली,
गुझिया मीठे पागों वाली।
किताबों की दुनिया.... नीरज गोस्वामी
दूर से इक परछाईं देखी अपने से मिलती-जुलती
पास से अपने चेहरे में भी और कोई चेहरा देखा
सोना लेने जब निकले तो हर-हर ढेर में मिटटी थी
जब मिटटी की खोज में निकले सोना ही सोना देखा
श्वेता सिन्हा के पसंदीदा ग़ज़लगो

दिलों के दरमियां...कुंवर बेचैन
फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक
यह तेरी काँवर नहीं कर्तव्य का अहसास है
अपने कंधे से श्रवण! संबंध का काँवर न फेंक
आज इतना ही..
इज़ाज़त दें
यशोदा ..
इस मंच में नवागन्तुक श्वेता जी का स्वागत है
आप जमशेदपुर से हैं...असाधारण घरेलू महिला
हार्दिक अभिनन्दन,,
........
सखी मीना जी का पसंदीदा साहित्यकार
ये रचना कक्षा दसवी के पाठ्यक्रम में है
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!........महादेवी वर्मा
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर!

अर्द्धांगिनी......सुशील शर्मा
पहले सिर्फ रिश्तों में थीं अब तो तुम्हारे अंग से मैं पूरा हुआ हूँ
"शैलेश ने वसुधा की गोदी में अपना सिर रखते हुए कहा।
बाहर बच्चों की किलकारियां और दीवाली के पटाखों की आवाज़ आ रही थीं
इधर वसुधा शैलेश के बालों में हाथ फिराते हुए सोच रही थी क्या सावित्री अपने सत्यवान को इसी तरह से यमराज से लड़कर वापिस लाई होगी। उधर शैलेश सोच रहा है कि वाकई पुरुष अपनी
अर्द्धांगिनी के बिना कितना अधूरा रहता है।
जलाएंगे दीपक, करेंगे प्रकाश, तुम्हारे लिये.... कुलदीप ठाकुर
हम जानते हैं
तुम्हे अपने घर में
फैला हुआ अंधकार
अच्छा नहीं लगेगा...
हम ये भी जानते हैं
तुम आओगे
किसी न किसी रूप में
हमारे साथ दिवाली मनाने....

दीवाली....श्वेता सिन्हा
लड़ियाँ नेह के धागों वाली,
झड़ियाँ हँसी ठहाकों वाली।
जगमग घर का कोना-कोना,
कलियाँ मन के तारों वाली।
रंग-रंगीली सजी रंगोली,
गुझिया मीठे पागों वाली।
किताबों की दुनिया.... नीरज गोस्वामी
दूर से इक परछाईं देखी अपने से मिलती-जुलती
पास से अपने चेहरे में भी और कोई चेहरा देखा
सोना लेने जब निकले तो हर-हर ढेर में मिटटी थी
जब मिटटी की खोज में निकले सोना ही सोना देखा
श्वेता सिन्हा के पसंदीदा ग़ज़लगो

दिलों के दरमियां...कुंवर बेचैन
फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक
यह तेरी काँवर नहीं कर्तव्य का अहसास है
अपने कंधे से श्रवण! संबंध का काँवर न फेंक
आज इतना ही..
इज़ाज़त दें
यशोदा ..



