सादर नमस्कार
मैं ये सोचती हूँ
इससे अच्छा कोई अभिवादन नहीं
इससे अच्छा कोई अभिवादन नहीं
आज अचानक मैं..क्यों
भाई ध्रुव जी अपरिहार्य करणों से प्रवास पर हैं.....
प्रस्तुति बनाने की शैली नही आती उनके समान
फिर भी कोशिश करती हूँ..बताइएगा....
मैं पास हुई या फिर फेल
चलिए देखते हैं आज क्या है...
चलिए देखते हैं आज क्या है...

और तो और..
उँगलियाँ मेरी..
करते करते टाईप
बहक-बहक सी
जाती थी..
झिड़कने पर
कहती थी उँगलिया..
जो मेरे मन में आ रही..
जा रही उसी अक्षर पर..

हरसिंगार... श्वेता सिन्हा
भोर किरण को छूकर चूमे
दूब के गीले छोर,
शापित देव न चरण चढ़े
व्यथित छलकती कोर,
रवि चंदा के मिलन पे बिछड़े
खिले है हरसिंगार।

मित्रता... नूपुरम
तुमने मुझे
कुछ कम पाया
और जताया,
रंग तुम्हारे फीके हैं,
और कई जगह दरार है,
कुछ करो ।

क्या एक बेटी को बचा नहीं सकते....ऋतु पंचाल
बहुत अत्याचार तुम्हारा सह चुकी,
जो कहना था वो मैं कह चुकी,
अब मुझे और न सताना,
मुझे दोबारा न पड़े, ये बताना।

बस, यूँ ही....मीना शर्मा
एक दीपक रात भर जलता रहा,
तमस की तकदीर फूटी, बस यूँ ही !!!
राह तक पापा की, बिटिया सो गई,
रोई-रोई, रूठी-रूठी, बस यूँ ही !!!

कहानी है मेरी पड़ोसन की....... सुधा सिंह
कहने लगा मुझसे-
आप अपने काम से काम रखो
आप जब घंटों लगी रहती हो फोन पे
अपनी सखियों के संग
तो क्या मैंने कभी डाला है
आपके रंग में भंग
आप कौनसा दादी की बात सुनती हो

चुप सो जा मेरे मन ...... सुधा देवरानी
रात छाई है घनी ......
पर कल सुबह होनी नयी,
कर बन्द आँखें , सब्र रख तू ;
मत रो ,मुझे न यूँ सता.......
चुप सो जा.......
मेरे मन.......
चुप सो जा.....!!!
आज बस
कहते हैं न, कापी किसी की..
और लिखे कोई और..
ये पन्ना श्रीमान जी ने खोला था
दो रचनाओं के लिंक रखे थे..
किसी क्लाईन्ट का फोन आया
उन्हें बिलासपुर जाना पड़ा..
कह गए देख लेना...
सो देख ली उन्हें...
य़शोदा ..

हरसिंगार... श्वेता सिन्हा
भोर किरण को छूकर चूमे
दूब के गीले छोर,
शापित देव न चरण चढ़े
व्यथित छलकती कोर,
रवि चंदा के मिलन पे बिछड़े
खिले है हरसिंगार।

मित्रता... नूपुरम
तुमने मुझे
कुछ कम पाया
और जताया,
रंग तुम्हारे फीके हैं,
और कई जगह दरार है,
कुछ करो ।

क्या एक बेटी को बचा नहीं सकते....ऋतु पंचाल
बहुत अत्याचार तुम्हारा सह चुकी,
जो कहना था वो मैं कह चुकी,
अब मुझे और न सताना,
मुझे दोबारा न पड़े, ये बताना।

बस, यूँ ही....मीना शर्मा
एक दीपक रात भर जलता रहा,
तमस की तकदीर फूटी, बस यूँ ही !!!
राह तक पापा की, बिटिया सो गई,
रोई-रोई, रूठी-रूठी, बस यूँ ही !!!

कहानी है मेरी पड़ोसन की....... सुधा सिंह
कहने लगा मुझसे-
आप अपने काम से काम रखो
आप जब घंटों लगी रहती हो फोन पे
अपनी सखियों के संग
तो क्या मैंने कभी डाला है
आपके रंग में भंग
आप कौनसा दादी की बात सुनती हो

चुप सो जा मेरे मन ...... सुधा देवरानी
रात छाई है घनी ......
पर कल सुबह होनी नयी,
कर बन्द आँखें , सब्र रख तू ;
मत रो ,मुझे न यूँ सता.......
चुप सो जा.......
मेरे मन.......
चुप सो जा.....!!!
आज बस
कहते हैं न, कापी किसी की..
और लिखे कोई और..
ये पन्ना श्रीमान जी ने खोला था
दो रचनाओं के लिंक रखे थे..
किसी क्लाईन्ट का फोन आया
उन्हें बिलासपुर जाना पड़ा..
कह गए देख लेना...
सो देख ली उन्हें...
य़शोदा ..