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सोमवार, 3 अगस्त 2026

4823 नया विषय, नया अंक गाड़ी ओव्हरनाईट लेट हो गई

 सादर अभिवादन 


प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः
नया विषय, नया अंक
गाड़ी ओव्हरनाईट लेट हो गई
सोचने में लगाम नहीं ..अलक ही क्यों
कविता क्यों नहीं सो अगली बार कविता भी साथ में 

अगस्त का महीना, राष्ट्रीय उत्सव भी है
भारतीय स्वतंत्रता दिवस की अग्रिम शुभकामनाएँ

सो अगला अंक 16 अगस्त 26 को
इसके लिए रचना प्रेषण तिथि 14 अगस्त 26 तक
नया विषय है आजादी, स्वतंत्रता


चलिए चलते है संग्रह की ओर




आज सभागार के बीच में चित्रकार ने एक बड़ा-सा दर्पण रख दिया था- भीड़ उसके सामने जमा हो गई थी- कुछ लोग बाल सँवार रहे थे, कुछ अपने चेहरे पर मुस्कान चढ़ाने में लगे थे, कुछ अपने गर्दन का कोण बदलने में-
जबकि दीवारों पर सजे हर चित्र में चेहरा अलग था—किसी की आँखें बड़ी, किसी की नाक टेढ़ी, किसी की त्वचा सांवली, किसी के बाल बिखरे।   




एक आदमी ने एक बहुत ही खूबसूरत लड़की से शादी की। शादी के बाद दोनो की ज़िन्दगी बहुत प्यार से गुजर रही थी। वह उसे बहुत चाहता था और उसकी खूबसूरती की हमेशा तारीफ़ किया करता था। लेकिन कुछ महीनों के बाद लड़की चर्मरोग (skinDisease) से ग्रसित हो गई और धीरे-धीरे उसकी खूबसूरती जाने लगी। खुद को इस तरह देख उसके मन में डर समाने लगा कि यदि वह बदसूरत हो गई, तो उसका पति उससे नफ़रत करने लगेगा और वह उसकी नफ़रत बर्दाशत नहीं कर पाएगी।



माता के जागरण के लिये कुल चंदे से आयी रकम : 23900 रुपये
माता के जागरण पर कुल खर्च : 8600 रुपये
बचत (लाभ) : 15300 रुपये
आयोजक नशे में धुत्त, संख्या में कुल तीन. तीनों ने अपने हिस्से का 5100 रुपये लिया और अपना-अपना जाम उठा लिया.
नेपत्थ्य से बाहर :
जागरण चरमोत्कर्ष पर. माँ का गुणगान जारी :
माता तेरी लीला अपरम्पार
मेरा भी कर दे बेड़ा पार ...


कल्पना - अनीता जी


वह बस स्टैंड पर खड़ी थी, बस आयी नहीं थी, 
बस आने वाले थी।अचानक उसने ज़ोर से कहा, थैंक्स, थैंक यू वेरी मच, 
लोग चौंक कर उसकी ओर देखने लगे। उसने ख़ुद भी स्वयं को देखा, 
अरे, यहाँ तो वह मंच नहीं था, जहाँ उसे पुरस्कार दिया जा रहा था। 
कल्पना में वह सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार ले रही थी।




अमित अरे माँ, बस इतनी सी बात,
तुम कहो और मैं ना आऊं,
ऐसा हो सकता है भला..???
मन में फूट रहे लड्डूओं की आवाज
छिपाते हुए बेटे जी ने जवाब दिया
सोच रही थी कि एक बार तुम दोनों मिल लेते तो...


इनके अलावा तीन नियमित रचनाएं भी परोस रहा हूँ





अपने दम पर छाया को ख़ुद 
घर बुला कर देखिए 

आएगी ख़ुशबू ही ख़ुशबू 
बस जरा हस्ती मिटा कर देखिए 







क्या आपने जूट की लकड़ी देखी है?
मेरे यहाँ पाटखोड़ी कहते हैं इसे, 
पतली-सी होती है,कमज़ोर सी,
पाँव पड़ते ही टूट जाती है,
पर जब यह जलती है,




मन एकांगी नहीं है 
यहाँ द्वैत है 
या कहें द्वैत ही मन है
बह ही नहीं सकती 
दो तटों के बिना नदी मन की ! 


सादर समर्पित
सादर वंदन
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