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गुरुवार, 20 नवंबर 2025

4577...ऊंघ रहे ओ पल, चल, दूर कहीं ले चल...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय  पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आज पढ़िए ब्लॉगर डॉट कॉम पर प्रकाशित रचनाएँ-

रामायण- मिथक से परे इतिहास की झलक-३

मंदिर से कुछ दूरी पर माणिक्य गंगा या रत्नों की नदी नामक एक पवित्र स्नान स्थल है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि इसमें स्नान करने से व्यक्ति के सभी रोग दूर हो जाते हैं क्योंकि इसमें रत्नों की प्रचुर मात्रा होती है और जंगल में बहने वाली नदी के किनारे लगे पेड़ों की जड़ों के औषधीय गुण भी इसमें समाहित होते हैं।

*****

ऊंघते पल

अनहद सपनों के पार, जहां, डूबा हो हर शै,

शायद छंट जाए, उन लम्हों में संशय,

इस जीवन को मिल जाए, जीने का आशय,

यहां, अधूरी सी हर बात,

अनबुझ सा हर पल!

ऊंघ रहे ओ पल, चल, दूर कहीं ले चल....

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मंजिलों से परे 

स्वागत में लगे बंदनवार की तरह

मुरझाने लगा है मन

धीरे -धीरे झड़ने लगी हैं पंखुड़ियाँ

किसी अपने की,

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कुंडलियां दिवस की बधाई

ईश्वर के इस रूप का,कैसे करूँ बखान।

निराकार साकार का,भेद नहीं आसान।।

भेद नहीं आसान,ईश हैं घट घट व्यापी।

कण कण में यदि वास,मूर्ति फिर रहे प्रतापी।।

मैं मूरख अंजान, सूक्ष्म कण काया नश्वर।

'शंकर' 'शिव' का भेद,बता दो मेरे ईश्वर।।

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शब्दों के मुक्ताहार

 बेजान अरसे से पड़ी थी दिल की जमीं

तुम मुस्कुराये और तबियत हरी हो गई

प्रेम का हल चला नैन किये उर्वरा जमीं

पहले से और भी मुसीबत खड़ी हो गई।

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 फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 


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